मोदी की कार्य शैली का समर्थन हूँ, अंध भक्त नहीं

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पद्मपति शर्मा, वरिष्ठ खेल पत्रकार :

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के समर्थन में दलाई लामा जी का बयान जो एक मित्र ने हमारी पोस्ट के कमेंट में लगाया था। उसे मैंने अपनी वाल पर पोस्ट कर दिया। बहुमत संघ के पक्ष में था जो कमेंट्स आए पर कुछ लोगों को यह आपत्ति है कि धर्मगुरु दलाई लामा का यह बयान नहीं है और मुझे कोसा गया कि मैं अपने पत्रकारिता धर्म को भूल कर अंध भक्ति में लगा हुआ हूँ।

यह आरोप अर्से से लगाया जा रहा है। मैंने जब जब कमेंट्स के उत्तर में स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया। लगता है वह नाकाफी रहा। सोचा कि आज उन आलोचकों को इस पोस्ट के माध्यम से जवाब दे दूँ।

पहले तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि हाँ संघी रहा हूँ सात आठ बरस की उम्र से ही। घर से भेजा गया था संस्कार पाने के लिए। वह मुझे मिले और अपने चार दशकीय पत्रकारिता यात्रा-पथ के दौरान मैंने उसके निर्वहन की पूरी चेष्टा की जो मुझसे परिचित हैं उन्हें मेरी शुचिता पर कभी संदेह नहीं रहा। चाहे वह पत्रकारिता रही हो या आम जीवन। शायद ही कोई सवाल करेगा, मेरी निष्ठा पर। संघ की अवधारणा वह नहीं जो उसकी कट्टर दुश्मन कांग्रेस आजादी बाद से कहती आयी है। इसी बल पर वह मुसलमानों के वोट लेती रही थी।

देश का जिन्होंने बंटवारा किया वही आज देश को बांटने का संघ पर घिनौना आरोप लगाते हैं, जबकि सच तो यह है कि संघ देश प्रेम की पाठशाला है। जो उसे कोसते हैं, एक बार संघ की शाखा में जा कर देखें तो सही कि वहाँ होता क्या है और फिर अपनी प्रतिक्रिया दें। एक सज्जन ने तो संघ को लेकर जिन शब्दों का उपयोग किया वह निहायत आपत्तिजनक था। मैं पलटवार कर सकता था, नहीं किया। सोचा उन महाशय को यहीं जवाब दूँ कि चलिए मेरे साथ एक दिन शाखा में या संघ के किसी बौद्धिक में तों आँख खुली की खुली रह जाएंगी। वहाँ न जातिवाद है और न मनुवाद। वहाँ है सिर्फ सेवा की भावना, हर स्तर पर। वनवासी आश्रमों का चक्कर लगा कर देखिए कि दलित हित किसकी प्राथमिकता में है। 

आलोचकों को यह बता दूँ कि सोशल मीडिया किसी मीडिया घराने की नहीं आम सोच का प्रस्फुटन है। वहाँ मैं पत्रकार नहीं एक आम नागरिक हूं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी कुछ होती है। पाठकों और दर्शकों का असीम प्यार मिला है मुझे बतौर पत्रकार। यह मंच मैंने कुछ पाने नहीं, कुछ देने के लिए चुना है। संघ की शाखा में गये चालीस बरस से ज्यादा समय हो गया होगा। गुरु दक्षिणा कार्यक्रम में भी नहीं गया पाँच दशकों से। संघ के किसी पदाधिकारी से शायद ही कोई संवाद हुआ हो। मेरी कोई राजनीतिक आकांक्षा भी कतई नहीं रही है शुरू से ही। मैं तो बनारस में यह भी नहीं जानता कि भाजपा कार्यालय का रास्ता किधर है। श्यामदेव राय चौधरी जैसे दो चार मित्र ही होंगे। हाँ मोदीजी के कार्यों का समर्थक हूँ और उन्होनें मुझे अभी तक तो निराश नहीं किया है, आगे की राम जाने।

(देश मंथन, 22 अप्रैल 2016)

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