राजीव रंजन झा : 

जब कोई याद दिलाना चाहे कि 15 लाख के "वादे" पर मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तो उनसे पूछिये कि जिस दिन यह "वादा" किया गया होगा, उस दिन अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर पहली खबर बना कर इस "वादे" को अपनी सुर्खियों में जगह दी होगी ना? चैनलों ने दिन में पचास बार इसकी हेडलाइन चलायी होगी ना? और हाँ, फिर आपने भी इस "वादे" के समर्थन-विरोध में फेसबुक-ट्विटर जैसे लोक-माध्यमों पर कुछ कहा होगा ना? तभी तो देश ने इस "वादे" पर मोदी को प्रधानमंत्री चुन लिया? 

उनसे अखबार की वह खबर दिखाने को कहिये, जिसमें 15 लाख के "वादे" को सुर्खियों में डाला गया हो। न दिखा सकें तो कोई बात नहीं। उनसे अपनी वह पोस्ट दिखाने को ही कहिये, जिसमें इस "वादे" पर मुग्ध हो कर उन्होंने भाजपा को वोट देने का वादा कर डाला हो, या दूरदर्शिता दिखाते हुए इसे जुमला बता दिया हो। आखिर जिस "वादे" पर सारे देश ने मोदी को प्रधानमंत्री चुन लिया, उस वादे को वादा करने के समय अखबारों, चैनलों और लोक-माध्यमों पर इतना प्रचार तो मिला होगा ना? बस उस समय के ऐसे प्रचार का संदर्भ देने का अनुरोध है। पर नहीं, वे आपके सामने क्या रखेंगे - गूगल पर, यू-ट्यूब पर खोज-खोज कर कहीं से एक भाषण का वीडियो!

लोकसभा चुनाव के करीब साढ़े छह महीने बाद राज्य सभा में चल रही एक चर्चा में कांग्रेस के आनंद शर्मा का वक्तव्य था - "इन्होंने कहा कि देश के हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपया... इस देश में एक पाँच हजार के ओवरड्राफ्ट के लिए लाखों-करोड़ों लोग बैंकों के आगे भाग रहे हैं, तो 15 लाख रुपये के लिए पूरा देश ने खड़े हो के कहा कि ये तो वाकई ही एक ऐसे महापुरुष... एक ऐसा वक्तव्य इन्होंने दिया है, एक ऐसा वायदा दिखाया है, ये तो होना चाहिए।"

संदर्भ : https://www.youtube.com/watch?v=wZgfkcmPKIM

अब इस बयान के संदर्भ में याद कीजिए कि क्या वाकई 2014 की चुनावी बहस का केंद्र बिंदु 15 लाख रुपये सबके खाते में डलवाने का चुनावी वादा था? 

वादा किया गया तो वह वादा करने की एक तारीख होगी। यह एक तथ्य होगा। 

उसके अगले दिन अखबार छपे होंगे, उनमें मोदी के भाषण की खबरें होंगी। यह एक तथ्य होगा।

उन खबरों में 15 लाख सबके खाते में डाले जाने के वादे का जिक्र है या नहीं, यह एक तथ्य होगा। 

इन तथ्यों पर न जा कर बस लोगों को भरमाना कि मोदी ने 15 लाख का वादा किया और अब वादाखिलाफी कर रहे हैं, यह भावना आधारित प्रचार है।

मोदी-विरोधियों के दावों के अनुसार ही यह बहुत बड़ी घोषणा थी, इसलिए स्वाभाविक होगा कि यह घोषणा भाजपा के चुनाव घोषणा-पत्र में भी रही होगी... क्या? नहीं है?!

हाँ, अपनी कुछ रैलियों में मोदी ने विदेशों में रखे काले धन की तुलना की थी। लेकिन क्या कोई वादा था? नहीं? क्या ऐसे किसी वादे पर देश ने मोदी के लिए वोट दिया? नहीं। चुनाव परिणाम आ जाने के बाद विरोधी नेताओं ने ही इस बात को उछालना शुरू किया। इसके बाद से ही कुछ लोग बार-बार दोहराते रहते हैं कि मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में सबके खाते में 15 लाख रुपये डलवाने का "वादा" किया था। दरअसल चुनावी नतीजे आने के काफी बाद ही लोगों को पता चला कि मोदी ने ऐसा कोई चुनावी वादा किया था! 

15 लाख का हिसाब वही पूछते हैं, जिन्हें 16 मई 2014 तक इसके बारे में कुछ पता भी नहीं था, और जिन्होंने 16 मई तक भाजपा को हराने के लिए ही काम किया या वोट दिया। मुझे ऐसे लोग कहीं नहीं दिखे, जिन्होंने 15 लाख का वादा सुन कर भाजपा को वोट दिया हो और अब इस बारे में निराश हुए हों।

निस्संदेह भ्रष्टाचार और काला धन 2014 के लोकसभा चुनाव का प्रमुख मुद्दा था। मोदी ने अपने हर चुनावी भाषण में काले धन का जिक्र किया। लेकिन विरोधियों का यह दावा निरा झूठ है कि मोदी ने सबके खाते में 15 लाख डलवाने का वादा किया था। हिटलर के प्रचार प्रमुख गोयबल्स की स्थापना थी कि एक झूठ बार-बार बोलते रहो तो लोग उसे सच मानने लगेंगे। इसलिए जो भी लोग यह दावा करेंगे कि मोदी ने सबके खाते में 15 लाख रुपये डलवाने का वादा किया था, उन्हें मैं उन्हें गोयबल्स का सच्चा चेला कहूँगा।

मोदी के एक ऐसे भाषण को यहाँ शब्दशः पढ़ लें :

"एक बार, ये जो चोर-लुटेरों के पैसे जो विदेशी बैंकों में जमा हैं ना, उतने के हम रुपये ले आये ना, तो भी हिंदुस्तान के एक-एक गरीब आदमी को मुफत में 15-20 लाख रुपये मिल जायेगा, इतने रुपये हैं। 

हमारे एमपी साहब कह रहे थे रेलवे लाइन। ये काला धन वापस आ जाये तो जहाँ चाहो वहाँ रेलवे कर सकते हो। ये लूट चलायी है, और बेशर्म हो करके कहते हैं। सरकार आप चलाते हो, पूछते मुझको हो कि कैसे लायेंगे। जिस दिन भारतीय जनता पार्टी को मौका मिलेगा, एक-एक पाई हिंदुस्तान की वापस लायी जायेगी और हिंदुस्तान के गरीबों के लिए काम लायी जायेगी। ये जनता के पैसे हैं, गरीब के पैसे हैं, हमारा किसान खेत में मजदूरी करता है उससे निकला हुआ धन है। उस धन पर हिंदुस्तान का अधिकार है। हिंदुस्तान के कोटि-कोटि गरीबों का अधिकार है।"

संदर्भ : https://www.youtube.com/watch?v=UOa04NN1M_Q

इसमें तुलना है कि विदेशों में किस भारी मात्रा में भारतीयों का काला धन जमा है। यह कहीं नहीं कहा गया कि यह पैसा वापस आयेगा तो सबके खातों में जमा कर दिया जायेगा। चुनाव घोषणा पत्र में भी काला धन वापस लाने की बात कही गयी थी, खाते में पैसा जमा करने की नहीं। काला धन वापस ला कर गरीबों के काम लाने (जैसे रेलवे लाइन बनाने) की बात कही गयी है, सबके खाते में जमा कराने की नहीं।

दरअसल इस मामले में भाजपा की दृष्टि से एक बड़ी गलती खुद इसके अध्यक्ष अमित शाह ने फरवरी 2015 में की। एबीपी न्यूज पर एक साक्षात्कार में किशोर अजवानी ने विरोधियों के सवालों का हवाला देकर पूछा कि 15 लाख रुपये खातों में क्यों नहीं आ रहे हैं। अमित शाह का जवाब था, "देखिए, ये जुमला है। किसी के एकाउंट में 15 लाख रुपया कभी नहीं जाता, ये उनको भी मालूम है और आपको भी मालूम है। देश की जनता को भी मालूम है। काला धन वापस ला कर गरीबों को फायदा पहुँचाने की बात है। उनकी योजनाएँ बनती हैं, उनके फायदे के लिए काम होता है। इस माध्यम से पैसा जाता है। किसी को कैश कभी नहीं दिया जाता, वो सबको मालूम है। ये भाषण देने का एक तरीका है, जुमला है।" 

संदर्भ : https://www.youtube.com/watch?v=Wo9EN-dlZns&t=32s

अमित शाह की गलती यह थी कि उन्होंने एक गलत शब्द का इस्तेमाल कर दिया - जुमला। इसका सीधा कारण यह है कि अमित शाह गुजराती हैं और भले ही हिंदी अच्छे से बोलते-समझते हैं, लेकिन हिंदी शब्दों को चुनने में उनसे गलती हो सकती है। उन्हें यह समझ में नहीं आया कि जुमला शब्द को इस तरह नकारात्मक ढंग से लिया जायेगा। हालाँकि एक शब्दकोश के अनुसार जुमला का अर्थ है (1) कुल जोड़ (2) पूरा वाक्य। विशेषण के रूप में इसका अर्थ बताया गया है - कुल, सब, पूरा। एक अन्य शब्दकोश में अरबी मूल के शब्द जुमला (जुम्ल:) का अर्थ है - समस्त, सब, समग्र, सर्व, जोड़, वाक्य, शब्द समूह, फ़िक़्र: (यानी फ़िक़रा, जिसका अर्थ है तंज़ की बात, व्यंग्य, कटाक्ष, छल की बात, बहाना)।

यानी जुमला ऐसे सारगर्भित वाक्य या शब्द-समूह को कहा जाता है, जो व्यंग्य या कटाक्ष में भी कहा गया हो सकता है, और छल या बहानेबाजी वाले फिकरे के रूप में भी हो सकता है। मगर व्यवहार में हिंदीभाषियों के बीच जुमला नकारात्मक ध्वनि ही प्रस्तुत करने लगा है, जिससे गुजराती-भाषी अमित शाह फरवरी 2015 के बाद ही परिचित हुए होंगे! इसीलिए उन्होंने भाषण देने के तरीके के रूप में जुमला शब्द का उपयोग किया।

उनकी दूसरी गलती यह थी कि उन्होंने 15 लाख खाते में डाले जाने की बात का स्पष्ट खंडन नहीं किया। वास्तविकता यह है कि मोदी के 2014 के किसी चुनावी भाषण में ऐसा जिक्र नहीं है। इसलिए 15 लाख खाते में डाले जाने की बात को जुमला या कुछ और कहने की जरूरत ही नहीं थी, वे सीधे नकार सकते थे कि ऐसा कहा ही नहीं गया। लेकिन संभवतः मीडिया के प्रचार के चलते अमित शाह जैसा व्यक्ति भी दबाव में आ जाता है!

(देश मंथन, 14 अक्टूबर 2017)

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