अन्ना आंदोलन को करीब से देखने वाले पत्रकार अनुरंजन झा ने इसके कई अनछुए अनजाने पहलुओं को पहली बार सामने लाते हुए एक किताब लिखी है - रामलीला मैदान। इसी किताब से प्रस्तुत है वह हिस्सा, जहाँ अनुरंजन जिक्र कर रहे हैं कि कई सारे ऐसे समाज-सेवी और बुद्धिजीवी जो आंदोलन के शुरुआत के दिनों में मूवमेंट में दिलचस्पी नहीं ले रहे थे या फिर धुर विरोधी थे, लेकिन एक समय वे एक-एक कर मंच पर आने लगे थे। क्या उनका आना अनायास था या फिर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था...

अरविंद जब इस जनलोकपाल की लड़ाई लड़ना चाहते थे तो उनको कोई चेहरा नहीं मिल रहा था जिसको आगे कर वे अपनी मंशा पूरी कर पायें। स्वामी रामदेव अरसे से काला धन - काला धन चिल्ला रहे थे। या तो वे अरविंद को भाँप गये थे या फिर अरविंद पर उनको भरोसा नहीं हुआ था कि यह व्यक्ति लंबी लड़ाई लड़ सकता है। जितने चालाक स्वामी रामदेव हैं, उसमें दोनों बातें संभव है और वैसे भी रामदेव श्रेय शेयर नहीं करना चाहते। अगर वे ऐसा करने वाले व्यक्ति होते तो उनके गुरु अचानक लापता नहीं होते और बालकृष्ण को भी उचित जगह मिलती। लिहाजा काफी मशक्कत और लगभग पूरे देश की खाक छानने के बाद अरविंद अन्ना के पास पहुँचे थे।

जैसा कि अब यह बात छुपी हुई नहीं है कि अरविंद इस आंदोलन के लिए सबसे पहले पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के पास गये, उनकी स्वीकृति नहीं मिलने के कारण वे श्री श्री रविशंकर के पास गये और फिर रविशंकर के बताये रास्ते पर चल कर अरविंद ने अन्ना का दामन थामा था। स्वभाव से सरल और बहुत ही सीधे-सादे अन्ना काफी समय तक अरविंद की मंशा भाँप नहीं पाये थे। अप्रैल में जब आंदोलन शुरू हुआ था तो उसी वक्त अन्ना को सोसायटी से उपर का दर्जा दिलाने की कोशिश की गयी थी। दिल्ली में मीडिया ने काफी जोर भी लगाया लेकिन अन्ना अब तक पूरे देश में नहीं पहुँच पाये थे। उन दिनों जब हमने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान का दौरा किया तो हमें यह अहसास हुआ कि देश में अन्ना को पहुँचने में अभी वक्त लगेगा या फिर किसी न किसी मोर्चे पर एक जबरदस्त सफलता की दरकार दिख रही थी।

अप्रैल के आंदोलन में काफी ऐसे समाज-सेवी थे जो मंच पर आना नहीं चाहते थे, मसलन योगेंद्र यादव, मेधा पाटकर, अरुणा राय। हमें एक वाकया याद है - अप्रैल के आंदोलन में मंच से मनीष और कुमार विश्वास लगातार योगेंद्र यादव को मंच पर आने के लिए न्यौता दे रहे थे। योगेंद्र वहाँ जाने से कतरा रहे थे। काफी बार बुलाने के बाद और फिर अरविंद के आग्रह के बाद ही योगेंद्र यादव मंच पर गये। जिन योगेंद्र यादव को मान-मनुहार के बाद अप्रैल में मंच पर बुलाया गया था वो अगस्त में उनकी टीम का हिस्सा बन चुके थे लेकिन बाद में उनके साथ क्या हुआ यह सबने देखा।

योगेंद्र यादव के प्रकरण पर विस्तार से चर्चा आगे करूँगा। यहाँ मैं सिर्फ बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि अगस्त में करप्शन और महँगाई के विरुद्ध चल रहे आंदोलन में अलग-अलग विचारधाराओं के बुद्धिजीवी शामिल हो रहे थे। देश हित के किसी उद्देश्य के लिए अलग-अलग विचारधारा के लोगों का साथ आना तो ठीक था, लेकिन इससे टकराव की आशंका बढ़ रही थी क्योंकि इस आंदोलन की कोई विचारधारा तय नहीं हो पा रही थी।

तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने आंदोलन की सराहना की थी और समर्थन देने का ऐलान किया था उधर अरविंद के पुराने मित्र और दिल्ली की मुख्यमंत्री के बेटे संदीप दीक्षित भी सरकार की कुछ नीतियों की आलोचना कर रहे थे।

संघ की मदद का असर था कि तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष ने आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। अप्रैल से अगस्त तक हालात बहुत बदल चुके थे। जहाँ अप्रैल में राजनेताओं को मंच से दूर रखा गया था, वहीं उसके बाद एकदिनी सांकेतिक अनशन में कांग्रेस से अलग सभी पार्टियों के नेताओँ को मंच पर जगह दी गयी। अगस्त में तो संघ औऱ बीजेपी ने पूरी कोशिश की कि इस आंदोलन को कांग्रेस के खिलाफ का आंदोलन बना दिया जाये। कुमार विश्वास औऱ किरण बेदी चूँकि बीजेपी से सॉफ्ट कॉर्नर रखते थे, वे इसका लाभ बीजेपी को दिलाना चाहते थे। हालाँकि कुमार विश्वास उन्हीं दिनों से एक अलग धड़ा बनाने की वकालत कर रहे थे।

अरविंद केजरीवाल के इशारे पर कुमार विश्वास ने संदीप दीक्षित को इशारा भी किया कि अन्ना के इस आंदोलन का लाभ राहुल गांधी उठा सकते हैँ। कवि महज कवि नहीं थे, वे राजकवि भी नहीं थे। वे उन कवि हृदय व्यक्तियों में शुमार होना चाहते थे जो सत्ता के शीर्ष पर आसीन हों। वो पेंटर तो बनना चाहते थे, लेकिन राजा रवि वर्मा की तरह। कुमार के संकेत के बाद संदीप दीक्षित ने केंद्र की सरकार की कुछ मुद्दों पर आलोचना भी की। बीजेपी के खुलेआम समर्थन देने के ऐलान के चंद घंटों के भीतर ही केजरीवाल को सफाई देनी पड़ी थी, क्योंकि उससे आंदोलन को एक पार्टी के विरोध में सीमित हो जाने का खतरा था।

अब अन्ना की टीम चाहती थी कि आंदोलन का श्रेय राहुल गांधी ले जायें। वे अन्ना के मंच पर आयें, कुछ आश्वासन दें औऱ अन्ना का अनशन तुड़वायें। अरविंद के देश के पहले लोकपाल बनने का रास्ता साफ हो… अन्ना देश के दूसरे गांधी साबित हों और बाकी की राजनीति बाद में तय की जाये। उस वक्त तक मनीष, कुमार विश्वास, प्रशांत भूषण के लिए कुछ भी भूमिका तय नहीं हो पा रही थी सिवाय एक सामान्य कार्यकर्ता के। हाँ, किरण बेदी को दिल्ली का एलजी बनाने की सहमति हो रही थी। राहुल गांधी की तरक्की नहीं चाहने वाले उनके सलाहकारों ने एक अविस्मरणीय मौका हाथ से गँवा दिया था। अगले दिन संसद में राहुल गांधी उलटबांसी करते नजर आये थे।

(देश मंथन, 24 अगस्त 2017)

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