पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिनों की चीन यात्रा ने एक तरफ जहाँ कूटनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी तो दूसरी ओर विपक्ष ने इस यात्रा को लेकर सवाल उठाये कि इससे हासिल क्या हुआ है? इस यात्रा के मायने क्या हैं और उससे भारत-चीन संबंधों की गाड़ी किस दिशा में बढ़ी है, यह समझने के लिए देश मंथन की ओर से राजीव रंजन झा ने बातचीत की भारत के पूर्व राजदूत जी. पार्थसारथी से।  

यह अनौपचारिक यात्रा अचानक क्यों हुई, यह बात काफी लोगों को समझ में नहीं आ रही है। 

देखिए अचानक कुछ नहीं हुआ, पिछले तीन-चार महीनों से संपर्क निकट रहा है। उनके विदेश मंत्री वांग यी यहाँ दिल्ली आये त्रिकोणीय बैठक के लिए, जहाँ रूस के विदेश मंत्री भी थे। वे सुषमा स्वराज से मिले। उसके बाद उनकी ओर से भारत-चीन सरहद के विषयों पर बातचीत करने वाले विशेष प्रतिनिधि यांग जेइची आये और डोभाल से मिले। फिर डोभाल खुद वहाँ गये, और सबसे महत्वपूर्ण यह था कि नवनियुक्त विदेश सचिव फरवरी में चीन गये। तो कुछ गहरी बातचीत पिछले तीन महीनों से हो रही है। फिर सुषमा जी और निर्मला सीतारमण चीन गयीं एससीओ की बैठक के लिए। उस सम्मेलन में मौका था चीन के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री से मिलने का। तो बातचीत की ये प्रक्रिया चल रही थी। 

फरवरी महीने में फोन पर मोदी जी ने खुद बात की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से। यह स्पष्ट हुआ कि चीन चाहता है कि कुछ परिवर्तन हो। उन्होंने एक अभूतपूर्व और एक नया तरीका सोचा कि क्यों न हम मिलें, फिर बैठ के बातचीत करेंगे। किसी औपचारिक एजेंडा वगैरह की जरूरत नहीं है, आराम से बात करेंगे। आप दो दिन के लिए आइये मेरे गृहनगर में। 

यह कूटनीति में एक किस्म का संदेश है कि उच्चस्तरीय निजी बैठक के बाद कुछ तरीके ढूँढें, जिससे मामला आगे बढ़ सके। ऐसा नहीं है कि इससे हर एक समस्या का हल हो जायेगा। यह तो होने वाला नहीं है। लेकिन समस्याएँ क्या हैं, दोनों तरफ विचार क्या हैं, इस पर सर्वोच्च-स्तरीय एक बहस हो, और इससे जो भी अच्छा निकल आये, उसे देखते हैं। 

अब दूसरी बात हमें यह समझनी चाहिए कि शी जिनपिंग चीन के ऐसे नेता हैं, जो शक्तिशाली हैं। वे न सिर्फ राष्ट्रपति और पार्टी अध्यक्ष हैं, बल्कि उनके मिलिटरी कमीशन के अध्यक्ष भी हैं। इस मिलिटरी कमीशन में सैनिक मामलों पर निर्णय लिये जाते हैं, जिसमें पोलित ब्यूरो के सदस्य सम्मिलित होते हैं। इनके पहले जो नेता थे, वे इस मिलिटरी कमीशन के अध्यक्ष नहीं थे। पहली बार कई सालों के बाद एक ऐसा चीनी नेता आया है देंग शियाओ पिंग के बाद, जो राष्ट्रपति भी है, पार्टी अध्यक्ष भी है और मिलिटरी कमीशन का अध्यक्ष भी है। मतलब पूरी शक्ति इनके हाथों में है। उनकी फौज को नियंत्रण में रखने के लिए इस तरह के नेता की जरूरत है। अब देखना पड़ेगा कि वे ऐसा करते हैं या नहीं। जहाँ तक सीमा विवाद की बात है, कई सालों से हमने ऐसे कई तरीके ढूँढ़ रखे हैं, जिससे तनाव हाथ से न निकल जाये, जैसे डोकलाम में होने वाला था। अब सैनिक कमांडर मिलेंगे कि हम ऐसे क्या कदम उठायें, कैसे संपर्क रखें, जिससे किसी भी घटना से तनाव नहीं बढ़े। 

मैं समझता हूँ कि चीन के साथ रिश्ते में हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है एक शांतिपूर्ण सीमा जहाँ तनाव न हो। देखते हैं कि यह आगे कैसे बढ़ता है, लेकिन यह बात हमें स्पष्ट है कि अगर सेना कुछ करे तो उनको सोच-समझ कर करना पड़ेगा। जैसे अगर विवादित हिस्सों में घुसपैठ वगैरह करे तो इस पर उनको पुनर्विचार करना पड़ेगा। इस पर स्पष्टीकरण देने के लिए जब हमारी और उनकी ओर से सैनिक मिलते हैं तो तय किया जा सकता है कि हम इस क्षेत्र में क्या स्वीकृति देते हैं, क्या कर सकते हैं, क्या हम नहीं मान सकते हैं।

इस यात्रा में मोदी और जिनपिंग छह बार मिले, नौ घंटे तक उनकी सीधी बातचीत हुई। लेकिन इसके बाद कोई बड़ी घोषणा नहीं हुई, या कोई समझौता नहीं हुआ है। तो क्या यह यात्रा भी आगे की किसी तैयारी का एक हिस्सा है, आगे कुछ और बड़ा होने वाला है?

हरेक उच्चस्तरीय बैठक में किसी समझौते पर हस्ताक्षर करना जरूरी नहीं है। लेकिन हम एक ऐसा वातावरण पैदा करें, जिससे तनाव न बढ़े और सहयोग बढ़े। अब देखना पड़ेगा कि आर्थिक विषयों पर जो हमने चिंताएँ व्यक्त की हैं, व्यापार के विषयों पर, देखें चीन उन पर क्या करता है।

लेकिन हमारे यहाँ विपक्ष पूछ रहा है कि इस यात्रा से मिला क्या?

हम क्या कहें विपक्ष के बारे में! यह आप जानें और वो जानें।

वे तो बोल रहे हैं कि रक्षा को खतरे में डाल दिया गया।

कैसे खतरे में डाला गया, यह मुझे नहीं समझ आता है। यह सब कहने वाली बातें हैं। सुरक्षा कैसे खतरे में पड़ी, यह आप उनसे पूछिए, मुझसे क्या पूछते हैं! मुझे तो यह बात समझ में नहीं आती।

हाल में पर्यावरण और डब्लूटीओ आदि को लेकर कई बार भारत और चीन वैश्विक मंचों पर एक साथ दिखे हैं, उनका एक जैसा रुख रहा है। क्या इन दोनों देशों के बीच कुछ नया समीकरण बन रहा है?

देखिए, हमारी चिंताएँ हैं व्यापार के विषय में, जो अपना घाटा है। दूसरी बात कि पाकिस्तान के साथ इनके जो संबंध हैं, उन्होंने सिर्फ हथियार ही नहीं दिये हैं, परमाणु अस्त्र और प्रक्षेपास्त्र दिये हैं। ये अभूतपूर्व चीजें होती हैं। वह चिंता तो जायेगी नहीं। देखिए पाकिस्तान के साथ क्या कार्रवाई करते हैं।

उसके साथ हमारी चिंताएँ हैं कि हमारे पड़ोस में जो भारत विरोधी नेता हैं, चाहे वे नेपाल में हों, चाहे वे मालदीव में हों, चाहे वे बांग्लादेश में हों, उनके साथ बड़े निकट संबंध बनाते हैं चीनी। देखना पड़ेगा कि कूटनीतिक रूप से वे क्या करते हैं। अगर उनका मकसद यही रहा कि पड़ोसियों के साथ भारत का संबंध बिगाड़ें, जो अभी हो रहा है मालदीव में, नेपाल में, और देखें बांग्लादेश के चुनाव में क्या करते हैं, तो हर चीज का निरीक्षण करना पड़ता है। उसमें समय लगता है। ऐसा नहीं है कि कल सुबह आके प्यार-मुहब्बत का रिश्ता बन जायेगा। 

एक तरफ तो बैठकें हो रही हैं, वैश्विक मंचों पर एक साथ रणनीति बना कर काम भी कर रहे हैं, और दूसरी तरफ आपने जैसा बताया कि चीन इतनी सारी बदमाशियाँ कर रहा है। ये दोनों चीजें साथ-साथ चलने का मतलब क्या है?

तो आप क्या कहेंगे उनसे? ये कहेंगे कि हम आपसे कुट्टी हैं! उनको समझाया गया, और वे जानते हैं कि अमेरिका, जापान, इंडोनेशिया वगैरह हमारे साथ मिले हुए हैं इनकी इन चीजों का विरोध करने के लिए। सिर्फ भारत की ही चिंता नहीं है, भारत भी दूसरे देशों के साथ संगठित हुआ है तो वह उनके लिए चिंता का विषय है। किसी किस्म का समझौता तो करना पड़ेगा न हिंद महासागर के बारे में। 

चीन जो बोल रहा है और जो करता है, दोनों में बहुत अंतर रहता है। कितना भरोसा करें उस पर?

मैं तो किसी पर भरोसा नहीं करता। अपने चचेरे भाई पर नहीं करता, तो चीन पर क्यों करूँ! उसकी कार्रवाइयों पर आप ध्यान रखें और उसके अनुकूल आप जवाब दें। चीन से दोस्ती मुझे समझ में नहीं आती, सहयोग समझ में आता है।

(देश मंथन, 01 मई 2018)

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