संदीप त्रिपाठी :

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी के राजनीतिक सचिव और कांग्रेस के वित्तीय संकटमोचक अहमद पटेल राज्यसभा चुनाव भले जीत गये, लेकिन इससे कांग्रेस की हार साबित होती है। दो बागी कांग्रेसी विधायकों द्वारा ज्यादा जोश दिखाये जाने से चुनाव आयोग ने कांग्रेस की आपत्ति पर उन विधायकों का वोट रद कर दिया और पटेल चुनाव जीत गये। अगर ये बागी कांग्रेसी विधायक अपना वोट दिखा कर न देते तो...?

पिछले विधानसभा चुनाव में 57 सीट जीतने वाली कांग्रेस को महज 44 वोट (इसमें भी एक जदयू का बागी है, जिसने पटेल को वोट दिया) दिला कर अहमद पटेल को राज्यसभा जिताने के लिए जितनी मशक्कत करनी पड़ी है, वह बताती है कि राज्य में कांग्रेस की हालत क्या है। वह भी तब, जब राज्य में विधानसभा चुनाव होने में महज 4-5 महीने शेष हैं।

मोदी जैसे करिश्मे वाला नेता नहीं

गुजरात में पिछले पाँच विधानसभा चुनावों से भाजपा जीतती आ रही है। इनमें से पिछले तीन चुनाव भाजपा ने मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में जीते। तीसरे चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी केंद्रीय राजनीति में आ गये। इसके बाद गुजरात में भाजपा ने आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन आनंदीबेन कमजोर मुख्यमंत्री मानी गयीं। उनके मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान एक नौजवान हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पटेलों का राज्यव्यापी आंदोलन चला, जिसे संभाल पाने में आनंदीबेन विफल रहीं। पटेल समुदाय गुजरात में आम तौर पर भाजपा समर्थक माना जाता रहा है। लेकिन हार्दिक के आंदोलन से भाजपा को चोट पहुँची। इसके बाद विजय रुपानी मुख्यमंत्री बने जो अभी इस पद को सँभाल रहे हैं। लेकिन रुपानी अब तक मोदी के शुरुआती दिनों जैसा करिश्मा भी पैदा कर पाते नहीं दिखे हैं।

कांग्रेस में भगदड़ सार्वजनिक

ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए गुजरात एक ऐसा राज्य था, जहाँ विधानसभा चुनाव में वह भाजपा के 22 वर्ष के शासन के खिलाफ सत्ताविरोधी रुझान का लाभ ले कर भाजपा के कांग्रेसमुक्त भारत के नारे को धता बता सकती थी। लेकिन राज्यसभा चुनाव ने साबित कर दिया कि कांग्रेस का बढ़त ले पाना तो दूर, फिलहाल तो उसके लिए पिछले विधानसभा चुनाव के प्रदर्शन को ही छू पाना बड़ी गनीमत होगी। दरअसल राज्यसभा चुनाव ने कांग्रेस पार्टी के भीतर मची भगदड़ को सार्वजनिक कर दिया है।

वाघेला की उपेक्षा से टूटी कांग्रेस

भाजपा ने जीत के लिए 44 वोटों के मुकाबले जिस दिन महज 30 वोटों के बूते एक अतिरिक्त प्रत्याशी को मैदान में उतारा था, कांग्रेस को उसी दिन समझ लेना चाहिए था कि क्या होने वाला है। अपने किले को सुरक्षित न रख पाने पर विरोधी पक्ष पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप मढ़ देने से कांग्रेस मजबूत नहीं हो जाती। गुजरात में कांग्रेस के सबसे बड़े जमीनी नेता शंकर सिंह वाघेला को पार्टी में पर्याप्त तवज्जो नहीं दी गयी। केंद्रीय नेता उनसे मिलने का समय तक नहीं निकाल पाये। अंतत: वाघेला पार्टी छोड़ गये। उनके साथ गये विधायकों के बाद कांग्रेस के पास 51 विधायक बचे। 

51 विधायक, लेकिन 44 वोट के लिए मोहताज

लेकिन इन 51 विधायकों में भी अहमद पटेल केवल 43 विधायकों का वोट पाने में समर्थ हो पाये। पटेल को 44वाँ वोट जदयू के इकलौते विधायक ने दिया जो शरद यादव के संपर्क में था, और पटेल किसी तरह राज्यसभा में पहुँच गये। यानी 51 विधायकों वाली पार्टी को महज 44 वोट के लिए भी मोहताज होना पड़ा। यह कांग्रेस की हार है। केवल 30 वोटों के बूते भाजपा के लिए तीसरे प्रत्याशी को जिताना असंभव था, लेकिन यह अमित शाह की मारक रणनीति थी कि अहमद पटेल हार की कगार पर पहुँच गये और चुनाव आयोग से महज तकनीकी आधार पर अपने खिलाफ गये दो कांग्रेसी विधायकों के वोट को रद्द करा कर जीतने में समर्थ हो पाये।

कांग्रेस की चरमरायी आंतरिक प्रणाली

यह पूरी कहानी कांग्रेस के अंदर की चरमरा चुकी प्रणाली को दर्शाती है। गुजरात में बाढ़ आयी हुई है, कई जिलों में हायतौबा मची हुई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को इस समय बाढ़ पीड़ितों को राहत देने और भाजपा सरकार की खामियों के खिलाफ जनता के आक्रोश को स्वर देने में जुटना चाहिए था। इसके बजाय कांग्रेस अपने विधायक दल में से राज्यसभा सीट जीतने के लिए जरूरी संख्या जुटाने में जुटी रही। स्पष्ट है कि कांग्रेस के भीतर भी अब कांग्रेस पर विश्वास नहीं रहा। अब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पूरी संभावना इस बात पर टिकी होगी कि भाजपा की ओर से कोई बहुत बड़ी चूक हो जाये, जिसकी संभावना अमित शाह के रहते तो नहीं दिखती। अमित शाह ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए 182 में से 150 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है।

(देश मंथन, 11 अगस्त 2017)

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