संदीप त्रिपाठी

भाजपा के शिखर पुरुष माने जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में संकटमोचक हनुमान रहे और भाजपा के संस्थापक सदस्य जसवंत सिंह जसोल के पुत्र भाजपा विधायक मानवेंद्र सिंह जसोल का पार्टी छोड़ना भाजपा के लिए बड़ा झटका तो नहीं, लेकिन हाँ! बड़ा नुकसान जरूर है। झटका इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले साढ़े चार साल से पार्टी उनके साथ जो बर्ताव कर रही थी और जिस तरह उनकी उपेक्षा की जा रही थी, उसकी तार्किक परिणति यही थी। तो कहीं न कहीं यह माना जा सकता है कि पार्टी के कुछ बड़े यह चाहते थे कि मानवेंद्र भाजपा छोड़ें। यह बात दीगर है कि इन कुछ बड़ों की इस चाहत के पूरे होने से होने वाले नुकसान की भरपाई का स्रोत मिलने तक इस घटनाक्रम को रोकने की कोशिश की जा रही थी।

साढ़े चार वर्ष से उपेक्षित रहे मानवेंद्र

राजस्थान के बाड़मेर जिले की शिव विधानसभा सीट से भाजपा विधायक मानवेंद्र सिंह जसोल राजपूत समुदाय से हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पिता जसवंत सिंह के बागी प्रत्याशी बनने के बाद से मानवेंद्र सिंह पार्टी में उपेक्षित हैं। मानवेंद्र सिंह ने इस बाबत नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक से बात की, सब जगह सहानुभूति मिली लेकिन साढ़े चार साल का वक्त बीतने पर भी कोई कदम नहीं उठाया गया। दरअसल वसुंधरा मानवेंद्र सिंह को कोई तवज्जो देने को कतई तैयार नहीं थीं। और आलाकमान राजस्थान में वसुंधरा के आगे बेबस दिखता है।

नाकाम हुईं मनाने की कोशिशें

आखिरकार वही हुआ जो होना था। मानवेंद्र सिंह ने बाड़मेर के पचपदरा में 22 सितंबर को स्वाभिमान रैली घोषित कर दी और इस रैली को सफल बनाने के लिए वे और उनकी पत्नी चित्रा सिंह पूरे मारवाड़ में जनसंपर्क करने लगे। उन्हें बढ़िया जनसमर्थन भी मिलने लगा। तब जाकर भाजपा आलाकमान के कान खड़े हुए और मारवाड़ क्षेत्र के ही एक राजपूत नेता केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को मानवेंद्र सिंह को मनाने के लिए लगाया गया। मानवेंद्र सिंह को मनाने के लिए भाजपा ने बाड़मेर के जिला अध्यक्ष जालम सिंह रावलोत को हटाकर मानवेंद्र सिंह के करीबी दिलीप पालीवाल को जिलाध्यक्ष बना दिया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थीं। यहाँ तक कि स्वाभिमान रैली से पूर्व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की फोन पर की गयी बातचीत भी बेकार गयी।

राजपूत समाज हो रहा एकजुट

स्वाभिमान रैली में मानवेंद्र सिंह ने भाजपा में शामिल होने को अपनी भूल बताया और भाजपा से नाता तोड़ लिया। रैली में करणी सेना के अध्यक्ष और एनकाउंटर में मारे गये आनंदपाल सिंह की माँ भी मौजूद थीं। इसका अर्थ है कि पूरे प्रदेश में करीब सात प्रतिशत की आबादी वाला राजपूत समुदाय भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहा है। मानवेंद्र सिंह के भाजपा छोड़ने का असर महज मारवाड़ क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसके राज्यव्यापी असर की गुंजाइश है।

कांग्रेस में शामिल होने पर अह-जह

स्वाभिमान रैली में कांग्रेस के पक्ष में और वसुंधरा-भाजपा के खिलाफ नारे लगे लेकिन मानवेंद्र ने कांग्रेस में शामिल होने की बाबत इतना ही कहा कि स्वाभिमान रैली के समर्थक जो कहेंगे, वही निर्णय किया जायेगा। बताया जा रहा है कि अलवर के कुँवर जितेंद्र सिंह के मार्फत मानवेंद्र सिंह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के संपर्क में हैं लेकिन कांग्रेस का अशोक गहलोत धड़ा मानवेंद्र के कांग्रेस में शामिल होने के खिलाफ है। दरअसल मानवेंद्र सिंह शिव विधानसभा से पत्नी चित्रा सिंह को लड़ाना चाहते हैं और बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र से अपनी पसंद का टिकट चाहते हैं।

43 सीटों में 39 पर जीती थी भाजपा

मारवाड़ में जोधपुर संभाग के 6 जिलों - बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, जोधपुर, पाली, सिरोही की कुल 33 सीट और नागौर जिले की 10 सीटों को मिलाकर कुल 43 विधानसभा क्षेत्र हैं। कभी कांग्रेस का गढ़ रहे मारवाड़ में पिछले चुनाव में भाजपा ने 39 सीट जीत कर इस गढ़ को ढहा दिया। कांग्रेस के खाते में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सीट समेत महज तीन सीट आयीं जबकि एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया था।

राजपूत, मुस्लिम समेत कई जातियों पर मानवेंद्र का असर

इस इलाके में 12 प्रतिशत राजपूत हैं जिन पर जसोल परिवार का अच्छा प्रभाव है। इसके कारण राजपूतों से जुड़ी राजपुरोहित, चारण, प्रजापत और अन्य पिछड़ी जातियाँ भी जसोल परिवार के प्रभाव क्षेत्र में हैं। एक और महत्वपूर्ण कोण यह है कि बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र में 20 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है जो जसोल परिवार के समर्थक है। इन मुस्लिमों में अधिकांश परिवारों के रिश्तेदार पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में हैं। जसवंत सिंह ने ही हिंगलाज यात्रा में इन सिंधी मुसलमानों का दर्द समझा था और उन्हें जोड़ने के लिए थार एक्सप्रेस चलवायी थी। अब मानवेंद्र सिंह के भाजपा छोड़ने से इन तमाम जातियों के भाजपा से विमुख होने के आसार हैं। अब मानवेंद्र सिंह का चाहे जो हो, भाजपा की चुनावी डगर काँटों भरी तो हो ही गयी है।

(देश मंथन, 24 सितंबर, 2018)

संदीप त्रिपाठी

भाजपा के शिखर पुरुष माने जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में संकटमोचक हनुमान रहे और भाजपा के संस्थापक सदस्य जसवंत सिंह जसोल के पुत्र भाजपा विधायक मानवेंद्र सिंह जसोल का पार्टी छोड़ना भाजपा के लिए बड़ा झटका तो नहीं, लेकिन हाँ! बड़ा नुकसान जरूर है। झटका इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले साढ़े चार साल से पार्टी उनके साथ जो बर्ताव कर रही थी और जिस तरह उनकी उपेक्षा की जा रही थी, उसकी तार्किक परिणति यही थी। तो कहीं न कहीं यह माना जा सकता है कि पार्टी के कुछ बड़े यह चाहते थे कि मानवेंद्र भाजपा छोड़ें। यह बात दीगर है कि इन कुछ बड़ों की इस चाहत के पूरे होने से होने वाले नुकसान की भरपाई का स्रोत मिलने तक इस घटनाक्रम को रोकने की कोशिश की जा रही थी।

साढ़े चार वर्ष से उपेक्षित रहे मानवेंद्र

राजस्थान के बाड़मेर जिले की शिव विधानसभा सीट से भाजपा विधायक मानवेंद्र सिंह जसोल राजपूत समुदाय से हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पिता जसवंत सिंह के बागी प्रत्याशी बनने के बाद से मानवेंद्र सिंह पार्टी में उपेक्षित हैं। मानवेंद्र सिंह ने इस बाबत नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक से बात की, सब जगह सहानुभूति मिली लेकिन साढ़े चार साल का वक्त बीतने पर भी कोई कदम नहीं उठाया गया। दरअसल वसुंधरा मानवेंद्र सिंह को कोई तवज्जो देने को कतई तैयार नहीं थीं। और आलाकमान राजस्थान में वसुंधरा के आगे बेबस दिखता है।

नाकाम हुईं मनाने की कोशिशें

आखिरकार वही हुआ जो होना था। मानवेंद्र सिंह ने बाड़मेर के पचपदरा में 22 सितंबर को स्वाभिमान रैली घोषित कर दी और इस रैली को सफल बनाने के लिए वे और उनकी पत्नी चित्रा सिंह पूरे मारवाड़ में जनसंपर्क करने लगे। उन्हें बढ़िया जनसमर्थन भी मिलने लगा। तब जाकर भाजपा आलाकमान के कान खड़े हुए और मारवाड़ क्षेत्र के ही एक राजपूत नेता केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को मानवेंद्र सिंह को मनाने के लिए लगाया गया। मानवेंद्र सिंह को मनाने के लिए भाजपा ने बाड़मेर के जिला अध्यक्ष जालम सिंह रावलोत को हटाकर मानवेंद्र सिंह के करीबी दिलीप पालीवाल को जिलाध्यक्ष बना दिया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थीं। यहाँ तक कि स्वाभिमान रैली से पूर्व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की फोन पर की गयी बातचीत भी बेकार गयी।

राजपूत समाज हो रहा एकजुट

स्वाभिमान रैली में मानवेंद्र सिंह ने भाजपा में शामिल होने को अपनी भूल बताया और भाजपा से नाता तोड़ लिया। रैली में करणी सेना के अध्यक्ष और एनकाउंटर में मारे गये आनंदपाल सिंह की माँ भी मौजूद थीं। इसका अर्थ है कि पूरे प्रदेश में करीब सात प्रतिशत की आबादी वाला राजपूत समुदाय भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहा है। मानवेंद्र सिंह के भाजपा छोड़ने का असर महज मारवाड़ क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसके राज्यव्यापी असर की गुंजाइश है।

कांग्रेस में शामिल होने पर अह-जह

स्वाभिमान रैली में कांग्रेस के पक्ष में और वसुंधरा-भाजपा के खिलाफ नारे लगे लेकिन मानवेंद्र ने कांग्रेस में शामिल होने की बाबत इतना ही कहा कि स्वाभिमान रैली के समर्थक जो कहेंगे, वही निर्णय किया जायेगा। बताया जा रहा है कि अलवर के कुँवर जितेंद्र सिंह के मार्फत मानवेंद्र सिंह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के संपर्क में हैं लेकिन कांग्रेस का अशोक गहलोत धड़ा मानवेंद्र के कांग्रेस में शामिल होने के खिलाफ है। दरअसल मानवेंद्र सिंह शिव विधानसभा से पत्नी चित्रा सिंह को लड़ाना चाहते हैं और बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र से अपनी पसंद का टिकट चाहते हैं।

43 सीटों में 39 पर जीती थी भाजपा

मारवाड़ में जोधपुर संभाग के 6 जिलों - बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, जोधपुर, पाली, सिरोही की कुल 33 सीट और नागौर जिले की 10 सीटों को मिलाकर कुल 43 विधानसभा क्षेत्र हैं। कभी कांग्रेस का गढ़ रहे मारवाड़ में पिछले चुनाव में भाजपा ने 39 सीट जीत कर इस गढ़ को ढहा दिया। कांग्रेस के खाते में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सीट समेत महज तीन सीट आयीं जबकि एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया था।

राजपूत, मुस्लिम समेत कई जातियों पर मानवेंद्र का असर

इस इलाके में 12 प्रतिशत राजपूत हैं जिन पर जसोल परिवार का अच्छा प्रभाव है। इसके कारण राजपूतों से जुड़ी राजपुरोहित, चारण, प्रजापत और अन्य पिछड़ी जातियाँ भी जसोल परिवार के प्रभाव क्षेत्र में हैं। एक और महत्वपूर्ण कोण यह है कि बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र में 20 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है जो जसोल परिवार के समर्थक है। इन मुस्लिमों में अधिकांश परिवारों के रिश्तेदार पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में हैं। जसवंत सिंह ने ही हिंगलाज यात्रा में इन सिंधी मुसलमानों का दर्द समझा था और उन्हें जोड़ने के लिए थार एक्सप्रेस चलवायी थी। अब मानवेंद्र सिंह के भाजपा छोड़ने से इन तमाम जातियों के भाजपा से विमुख होने के आसार हैं। अब मानवेंद्र सिंह का चाहे जो हो, भाजपा की चुनावी डगर काँटों भरी तो हो ही गयी है।

(देश मंथन, 24 सितंबर, 2018)

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