राजेश रपरिया :

दालें, तेल,  चीनी,  दूध और अंडे की बेलगाम महँगाई के साथ ही अचानक ही पिछले सात-दस दिनों में टमाटर की कीमतों की भारी उछाल आयी है।

पिछले पखवाड़े 20-25 रुपये प्रति किलोग्राम मिलने वाला टमाटर अब दिल्ली में 50 रुपये किलो के भाव बिक रहा है। देश के कुछ महानगरों में टमाटर के भाव 80 से 100 रुपये किलो तक भी पहुँच गये हैं। अचानक टमाटर में आयी तेजी के लिए व्यापारी मानसून में देरी और सूखा को कारण बता रहे हैं।

थोक व्यापारी समझा रहे हैं कि 40-50 रुपये किलोग्राम के भाव से दस-बीस ट्रक कर्नाटक और महाराष्ट्र  जा रहे हैं, क्योंकि वहाँ टमाटर की फसल चौपट हो गयी है और इससे टमाटर के दाम अचानक बढ़ गये हैं। लेकिन कृषि मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार तथ्य यह है कि कर्नाटक को छोड़ कर बाकी बड़े टमाटर उत्पादक राज्य, जैसे महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में टमाटर की पैदावार बढ़ी है। यहाँ टमाटरों के बाजार भावों में सबसे ज्यादा तेजी दर्ज हुई है। अधिक उत्पादन के बीच इस तरह से बाजार भाव बढ़ना केवल जमाखोरी का ही संकेत है। 

पिछले दो साल से देश में सूखा पड़ रहा है। पर इस साल अचानक टमाटर इतने भाव क्यों दिखा रहा है? सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2015-16 में टमाटर का उत्पादन 1.82 करोड़ टन हुआ था,  जो इसके पिछले साल हुए उत्पादन से 20 लाख टन ज्यादा है। सर्वज्ञात तथ्य है कि किसानों के स्तर पर टमाटर का संग्रहण और उसकी आपूर्ति रोकना असंभव है। 

हरियाणा के किसानों ने डेढ़ दो महीने पहले बंपर फसल के कारण टमाटरों को सड़ाना बेहतर समझा था, क्योंकि उनको बाजार में टमाटर की कीमत एक-दो रुपये से ज्यादा नहीं मिल रही थी। इन किसानों का कहना था कि इस भाव पर लागत भी नहीं निकल रही है तो ट्रांसपोर्ट पर पैसा क्यों खर्च करें?

क्या आपको किसी दल के नेता मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आदि का इस दुर्दशा पर कोई वक्तव्य याद है? मुद्दा यह भी है कि कीमत स्थिरीकण फंड का इस्तेमाल बाजार में भावों के नियंत्रण के लिए है या किसानों के लिए भी?

इस साल मानसून में तनिक देरी हुई है, जैसा कि मौसम विभाग कह रहा है। मौसम विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे ठहर कर बुआई करें, यानी खरीफ फसल की बुआई में थोड़ा विलंब हो सकता है। पर खरीफ फसल की आपूर्ति का असर अक्तूबर-नवंबर में होना चाहिए। टमाटर में आयी तेजी से पहले से ही आलू, भिंडी, तौरी और घीया जैसी सब्जियाँ भी अधिक महँगी बिक रही हैं। खाद्य पदार्थों में दो अंकों की महँगाई का कोई मुकम्मल जवाब केंद्र और राज्य सरकारों के पास नहीं है। क्या वजह है कि एक समय में किसी एक ही खास खाद्य पदार्थ के दाम आसमान छूने लगते हैं? मोदी सरकार सुशासन के कितने भी दावे कर ले, लेकिन वह देश के खाद्य बाजार में माफियाओं पर अंकुश लगाने पर विफल रही है। अचानक खाद्य पदार्थों की कीमत में वृद्धि होना माफियाओं का खेल है। विडंबना यह है कि राज्य सरकारें भी इनकी ओर से आँखें मूंदे बैठी हैं, क्योंकि ये लोग चुनाव फंडिग का बड़ा सोत्र हैं। राज्य सरकारों की निष्क्रियता के कारण ही जमाखोरी रोकने के बारे में केंद्र सरकार के प्रयास नाकाम हो रहे हैं। (देश मंथन, 17 जून 2016)

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