कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार :  

हंगामा है, न गुस्सा। न चिन्ता है, न क्षोभ। 'ग्रेट इंडियन बैंक डकैती' हो गयी तो हो गयी। लाखों करोड़ रुपये लुट गये, तो लुट गये। खबर आयी और चली गयी। न धरना, न प्रदर्शन, न नारे, न आन्दोलन। न फेसबुकिया रणबाँकुरे मैदान में उतरे। न किसी ने पूछा कि कर्ज़ों का यह महाघोटाला करनेवाले कौन हैं?

फर्ज़ी वीडियो टेप के झूठे भाषण के सहारे कन्हैया कुमार को 'देशद्रोही' घोषित कर देनेवाली सरकार ने अभी तक रस्मी तौर पर भी नहीं कहा कि वह इस महाघोटाले के दोषियों का पता लगाने के लिए कोई जाँच करेगी, या उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी, जो लाखों करोड़ की यह रकम डकार गये। कोई एक-दो लाख करोड़ नहीं, बल्कि करीब साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये के कर्ज़े ऐसे हैं, जिनकी वसूली की सम्भावना अब न के बराबर समझी जा रही है! यानी भारत की कुल जीडीपी का करीब 6.7% हिस्सा चट किया जा चुका है या जिसके वापस मिलने की अब लगभग उम्मीद नहीं है!

इतना सन्नाटा क्यों है भाई!

'शोले' का डायलॉग याद है आपको—इतना सन्नाटा क्यों है भाई? वाकई इतने भयानक आँकड़ों के बाद भी ऐसी उदासीनता क्यों? जवाब बड़ा आसान है और सबको मालूम भी है। क्योंकि सारा का सारा मामला देश के शीर्षस्थ अमीरों से जुड़ा है, जो बड़े आराम से कर्ज गड़प गये और ऐश कर रहे हैं! कुछ आँकड़ों को देखिए। हिल जायेंगे! सरकारी बैंकों के कुल डूबे कर्ज़ों का 87% हिस्सा ऐसे कर्ज का है, जो पाँच करोड़ रुपये से ऊपर के हैं। जाहिर है कि यह कॉरपोरेट कर्ज है। किसान और छोटे-मँझोले कारोबारी इतना बड़ा कर्ज ले ही नहीं सकते। रिजर्व बैंक के ताजा अनुमानों के मुताबिक सरकारी बैंकों के कुल एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट या आम भाषा में कहें तो डूब गयी रकम) का एक-तिहाई हिस्सा सिर्फ 30 बकायेदारों के जिम्मे है। सिर्फ तीस!

जानबूझ कर नहीं चुकाते कर्ज!

'राग देश' के एक पाठक अम्बुज गुप्त कई महीनों से कह रहे थे कि मुझे बैंक कर्ज़ों के घालमेल पर लिखना चाहिए। फिर पिछले हफ्ते भी उन्होंने याद दिलाया। और जब इस पर खोजबीन करने बैठा तो कई चौंकानेवाली बातें सामने आयी, जिनमें एक बेहद चौंकानेवाली बात तो यही है कि कर्ज़ों का भुगतान न करनेवाले लोगों में ऐसे लोगों की भी बड़ी संख्या है, जो जानबूझकर कर्ज़े नहीं चुका रहे हैं! यानी उन्हें मालूम है और पक्का इत्मीनान है कि उनके खिलाफ कुछ भी नहीं किया जायेगा!

कौन हैं बकायेदार, जो सब गड़प गये?

कौन हैं ये बकायेदार? कोई इनका नाम बताने को तैयार नहीं है। तर्क दिया जा रहा है कि ऐसा करना बैंक और ग्राहक की गोपनीयता को भंग करना होगा, जो कानूनी तौर पर जायज नहीं है। वाह जनाब वाह! मान गये हुजूर! लेकिन एक सवाल पूछने की ग़ुस्ताखी कर रहा हूँ। यह तर्क 2011 में कहाँ था, जब कुछ बैंक 'शर्म करो' अभियान के तहत अपने उन बकायेदारों के नाम और फोटो अखबारों में विज्ञापन देकर और सड़कों पर होर्डिंग लगा कर छाप रहे थे, जो महज कुछ हजार या कुछ लाख का कर्ज नहीं चुका पाये थे! यही नहीं, उन्हें धमकी यह भी दी गयी कि अगर अब भी उन्होंने कर्ज नहीं चुकाया तो उनकी गारंटी लेनेवाले लोगों के नाम और फोटो छाप कर उन्हें भी 'लज्जित' किया जायेगा!

तो चार साल पहले गरीब और आम आदमी की इज्जत से खुलेआम और मनमाना खिलवाड़ करनेवाले बैंक और सरकार आज 'ग्राहक की गोपनीयता' की दुहाई क्यों दे रहे हैं? इसीलिए न कि मामला बड़े-बड़े अमीरों की इज्जत का है!

क्रेडिट सूइज की रिपोर्ट

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कर्ज गड़प कर बैठे लोगों के नाम लोगों को पता नहीं हैं। कारपोरेट कारोबार और शेयर बाजार पर पैनी नजर रखनेवाली (Credit Suisse)'क्रेडिट सूइज सिक्योरिटीज रिसर्च ऐंड एनालिटिक्स' की अक्तूबर 2015 की 'हाउस ऑफ़ डेब्ट' (House of Debt 2015) रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले तीन सालों में कर्ज के बोझ से सबसे ज्यादा दबे दस कारपोरेट समूहों में लैन्को, जेपी समूह, जीएमआर, वीडियोकॉन, जीवीके, एस्सार, अडानी, रिलायन्स अनिल धीरूभाई अम्बानी समूह, जेएसडब्लू और वेदान्ता शामिल हैं। देश में समूचे कॉरपोरेट कर्ज का 27%  हिस्सा इन दस कॉरपोरेट समूहों के ही नाम है। एक और चौंकानेवाला तथ्य यह है कि पिछले आठ सालों में इनके ऊपर कर्ज सात गुना बढ़ गया! मतलब? साफ है कि इन आठ सालों में इन्हें लगातार और धड़ाधड़ कर्ज मंज़ूर किये गये।

क्रेडिट सूइज का यह भी कहना है कि इस कर्ज के बड़े हिस्से को बैंकों ने अभी तक 'स्ट्रेस्ड एडवान्सेज' यानी 'संकट में पड़ा कर्ज' (ऐसा कर्ज जिसके डूब सकने का संकट दिखने लगे) घोषित नहीं किया है, जबकि यह कर्जे लगभग खतरे के निशान को छू रहे हैं। मतलब यह कि इनकी गिनती उस 'डूब चुके कर्ज' या 'डूब सकने की सम्भावना वाले कर्ज' में नहीं है, जिनकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं, जबकि जेपी, लैन्को, एस्सार और जीएमआर के कर्ज को तो रेटिंग एजेन्सियाँ लगभग डूबा हुआ मान ही चुकी हैं। कुल मिला कर इन दस बड़े समूहों पर कुल 7 लाख 33 हजार करोड़ के कर्ज में से कम से कम 20 से लेकर 90% कर्ज डूबने के कगार पर आ चुका है, (लिंक में दिया ग्राफिक्स देखिए)। सब मिला कर देश में बैंकों के कुल कर्ज का 17% हिस्सा ऐसा है, जिसके लौटने के आसार या तो नहीं हैं या बेहद कम हैं।

अमीर कर्ज, गरीब कर्ज का फर्क!

अगर अमीर कर्जदारों के नाम बताने में इतना संकोच है, तो उनसे कर्ज वसूलने के लिए बैंक क्या करते होंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है। वैसे गरीबों से बैंक कैसे कर्ज वसूलते हैं, यह आसपास कुछ लोगों से पूछ कर देखिए। किसानों की दयनीय हालत और उनकी लगातार बढ़ती आत्महत्याओं के बावजूद दस-दस हजार रुपये के बकाये वसूलने के लिए बैंक कैसे अमानवीय तरीके अपनाते हैं, यह किसे पता नहीं? लेकिन अब न बैंक बोल रहे हैं, न सरकार बोल रही है कि इन अमीर कर्जदारों से बकाया वसूलने के लिए कुछ किया भी जायेगा या नहीं। सरकार एक 'बैड बैंक' बनाने की सोच रही है, जिसके जिम्मे सारा डूबा हुआ कर्ज दे दिया जाये और जो उसे वसूलने की कोशिश करता रहे। वसूल पाये या न वसूल पाये, यह अलग बात है। बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद स्थिति शायद कुछ बदले।

Why 90% Bad Bank Loans belongs to Public Sector Banks?

सवाल यह है कि बैंकों ने यह कर्ज क्या देख कर दिया, जो डूब गया? और सरकारी बैंकों का ही कर्ज इस तरह क्यों डूबता है? एक रिपोर्ट के मुताबिक दिसम्बर 2015 की तिमाही के अन्त में 25 सरकारी बैंकों का एनपीए 3 लाख 96 हजार करोड़ रुपये था, जबकि 14 निजी बैंकों का कुल एनपीए महज करीब साढ़े 41 हजार करोड़ रुपये था। यानी सारे बैंकों के कुल एनपीए का 90% से ज्यादा हिस्सा सरकारी बैंकों (Government Owned Banks) के ही मत्थे है। यानी कहीं न कहीं सरकारी बैंकों की कर्ज मंजूर करने की प्रक्रिया में भारी गड़बड़ तो है। मान लिया कि सरकारी बैंकों पर सावर्जनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कर्ज देने का दबाव भी रहता है और इनमें से कई सार्वजनिक उपक्रम गवर्नेन्स और लाभ कमाने के मामले में खोटे हैं। ऐसे कर्ज़ों को छोड़ भी दें, तब भी डूबे कर्ज़ों का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो सवालों के घेरे में है कि यह कर्जे किस आधार पर दिये गये?

बरसों से गड़बड़ी, किसी को दिखी क्यों नहीं?

सरकारी बैंकों के बोर्ड में एक रिजर्व बैंक का डायरेक्टर होता है और एक सरकार का प्रतिनिधि। फिर ऑडिटर होते हैं। इतने बरसों से बैंकों में चल रही गड़बड़ किसी ने पकड़ी क्यों नहीं? इस बन्दरबाँट की जाँच कराने की कोई बात नहीं कर रहा है। बस सरकार यह कह रही है कि आगे से गड़बड़ न हो, इसे रोकने के लिए एक बैंक बोर्ड ब्यूरो बनाया जायेगा, जिसमें उद्योग जगत के नामी-गिरामी और विश्वसनीय चेहरे होंगे, जो बैंक बोर्डों में डायरेक्टरों की नियुक्ति करेंगे। सरकारी बैंकों के प्रबन्धन को 'प्रोफेशनल' बनाने के लिए सरकार उनमें अपनी हिस्सेदारी घटा कर 51% करेगी। यह सब तो ठीक है, लेकिन जो लूट हो गयी, उसका क्या, उस पर सब चुप हैं। विपक्ष भी बिलकुल चुप है क्योंकि बरसों से चल रहे इस खेल में वह तो कहीं ज्यादा दोषी है! फिर सरकार क्यों फिक्र करे? घोटाले को भरने के लिए जनता का पैसा है ही और जनता को भरमाये रखने के लिए जेएनयू जैसे मुद्दे हैं ही!

(देश मंथन, 20 फरवरी 2016)

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