राजीव रंजन झा : 

इस देश की जनता सांसद चुनती है, प्रधानमंत्री नहीं। 

यही संविधान है ना!

1952, 1957, 1962 के चुनावों में नेहरू जी प्रधानमंत्री पद का चेहरा नहीं थे। किसी को पता नहीं था कि इन चुनावों में कांग्रेस जीती तो नेहरू प्रधानमंत्री बनेंगे या कोई और बनेगा। 

1967, 1971 में किसी को पता नहीं था कि इंदिरा जी वाली कांग्रेस को अगर लोकसभा चुनाव में बहुमत मिला तो प्रधानमंत्री इंदिरा जी ही बनेंगी या सांसद किसी और को चुनेंगे। 

1980 में कांग्रेस यह तय नहीं कर पायी थी कि वह सत्ता में लौटी तो इंदिरा जी ही फिर से प्रधानमंत्री बनेंगी या उसके लोकसभा सांसद नया पीएम चुन लेंगे। 

1984 में अगर कांग्रेसी सांसद चाहते तो वे राजीव गांधी के अलावा किसी और को भी प्रधानमंत्री बना सकते थे, यह उन सांसदों का स्वविवेक था जिसके आधार पर उन्होंने राजीव गांधी को चुना। 

1989 में अगर कांग्रेस फिर से जीत जाती तो क्या पता कांग्रेस के सांसद राजीव गांधी के अलावा किसी और को भी प्रधानमंत्री बना देते! और उस साल जनता दल की अगुवाई में कांग्रेस विरोधी दलों ने वी. पी. सिंह के चेहरे पर चुनाव कहाँ लड़ा था? वह तो बाद में सब सांसदों ने तय किया कि वी. पी. सिंह ही प्रधानमंत्री बनेंगे। 

1991 में अगर राजीव गांधी की त्रासद हत्या नहीं हुई होती और कांग्रेस सत्ता में लौटती, तो राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनते ऐसा जरूरी थोड़े ही था। वह फैसला तो सांसदों के बीच चुनाव से होता। है ना!

ओह, क्या इन सारे वर्षों में फैसला भले ही संविधान के अनुसार सांसदों को करना था, लेकिन वह फैसला पहले से तय नहीं था?

पूछा जा सकता है कि 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के समय तो पहले से तय नहीं था, सांसदों ने ही तय किया। इसी तरह 1996 में भी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला भी तो सांसदों का ही था, पहले से उनका नाम तय नहीं था। 2004 में मनमोहन सिंह के चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ा गया था। 

लेकिन 1977 में इसका नतीजा हमने देखा था। मोरारजी देसाई की सरकार चली दो साल 126 दिन, और फिर चरण सिंह की सरकार रही केवल 170 दिन तक। देवेगौड़ा 12 महीने भी पूरे नहीं कर पाये और इंदर कुमार गुजराल को भी ऐसा सौभाग्य नहीं मिला, बस 332 दिनों में खिसक गये। 

अरे हाँ, मनमोहन सिंह जी तो 10 साल टिके ना!  लेकिन उन्हें सांसदों ने चुना था या एक आलाकमान ने, यह सभी जानते हैं। रिमोट कंट्रोल प्रधानमंत्री का सच तो इस साल पहली बार मतदान करने वाले 18 वर्षीय युवाओं को भी पता होगा। 

इसलिए भाजपा विरोधी दलों को बहुमत मिलने पर उनका प्रधानमंत्री कौन होगा, इस सवाल को खारिज न करें। यह संविधानेतर सवाल नहीं, भारतीय राजनीति का केंद्रीय प्रश्न है। जनता पहले लोकसभा चुनाव से ही प्रधानमंत्री के चेहरे को देख कर सांसद चुनती आयी है। लोकसभा सांसद मिल कर प्रधानमंत्री चुनते हैं, यह केवल कागजी सच है। इसलिए सवाल से भागें नहीं, साफ बतायें। भाजपा के जीतने पर नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनेंगे यह तय है। बतायें कि अगर भाजपा विरोधी दल बहुमत तक पहुँच सके तो किसको प्रधानमंत्री बनाने वाले हैं? इस सवाल का जवाब जानना जनता का राजनीतिक अधिकार है।

(देश मंथन, 27 मार्च 2019)

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