अभिरंजन कुमार, वरिष्ठ पत्रकार :

जब मैंने प्रधानमंत्री मोदी से पूछा कि ‘चुनाव के उत्सव में कब्रिस्तान और श्मशान कहाँ से ले आए मोदी जी?’, इसके बाद मेरे पास तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं। जो प्रतिक्रियाएं मेरे सवाल के साथ सहमति में आईं, उन्हें सामने रखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनकी बात तो मैं कह ही चुका हूँ, लेकिन जो प्रतिक्रियाएं असहमति में आईं हैं, उन्हें स्पेस देना भी जरूरी लग रहा है।

 

किन्हीं अनामिका सिंह ने मेरे फेसबुक पेज पर एक तस्वीर भेज कर बताने की कोशिश की है कि चुनाव में कब्रिस्तान और श्मशान कहाँ से आया। यह तस्वीर किसी जगह पर सिंचाई विभाग की जमीन कब्रिस्तान के लिए स्वीकृत करने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को बधाई देते एक पोस्टर की है। मैं इस तस्वीर की सत्यता की पुष्टि नहीं करता, लेकिन पाठकों के लिए साझा कर रहा हूँ।

कुछ अन्य मित्रों ने कहा कि दिल्ली में बंद कमरे में बैठ कर किसी पत्रकार के लिए ऐसे सवाल उठाना आसान है, लेकिन यह उत्तर प्रदेश की कड़वी सच्चाई है कि वहाँ सरकारी योजनाओं में धर्म के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। जिन गाँवों से अखिलेश यादव की पार्टी को वोट नहीं मिलते या कम मिलते हैं, वहाँ बिजली नहीं दी जाती, पर जिन गाँवों में बिजली देने से सांप्रदायिक तुष्टीकरण का मकसद पूरा हो सकता है, वहाँ निर्बाध बिजली दी जा रही है।

कुछेक मित्रों ने कहा कि जब पिछले प्रधानमंत्री ने एक चर्चित सांप्रदायिक बयान दिया था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है, तब उसमें किसी को अटपटा नहीं लगा था, लेकिन जब मौजूदा प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि किसी भी सरकार को धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए, तो लोग बात का बतंगड़ बना रहे हैं।

कुछ मित्रों ने कहा है कि मायावती हर सभा में एक धर्म विशेष के लोगों से खुलेआम वोट माँगती हैं, वह भी तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, लेकिन उनके लिए मर्यादा की बात कोई नहीं कर रहा। इसी तरह अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह भी समुदाय विशेष के वोट लेने के लिए हिन्दुओं पर गोली चलवाने की घटना का खुलेआम ढिंढोरा पीटते हैं, जैसे इतने लोगों का नरसंहार करके बड़े पुण्य का काम किया हो, फिर भी कोई उनके लिए मर्यादाएं तय नहीं कर रहा। फिर सारी मर्यादा मोदी के ही लिए फिक्स की जा रही हैं, क्यों?

अपने तमाम ऐसे मित्रों से कहना चाहूँगा कि आज राजनीति की रग-रग में इतनी गंदगी घुस गयी है कि किसी भी गलत बात को जस्टिफाइ करने के लिए सैकड़ों-हजारों दलीलें दी जा सकती हैं। लेकिन दूसरा गलत कर रहा है, इसलिए हम भी गलत करें, यह कोई दलील नहीं हो सकती।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने सांप्रदायिक सियासत की सारी हदें लांघ डाली हैं, लेकिन इससे भारतीय जनता पार्टी को यह लाइसेंस नहीं मिल जाता, कि वह भी उसी भाषा में उनका जवाब दे। ख़ासकर प्रधानमंत्री देश का सबसे गरिमामय राजनीतिक पद होता है, इसलिए उनके मुँह से एक-एक शब्द काफी नाप-तौल कर निकलना चाहिए।

मैंने अपने पिछले लेख में यह तो कहा ही था कि प्रधानमंत्री की यह बात बिल्कुल उचित है कि धर्म के आधार पर किसी सरकार को भेदभाव नहीं करना चाहिए, लेकिन आगे इसकी व्याख्या में उन्होंने जो बातें कही, उससे उन्हें बचना चाहिए था। अगर प्रधानमंत्री ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया है, तो उनकी किसी भी बात से उनकी मंशा पर सवालिया निशान नहीं लगना चाहिए। साथ ही, देश के प्रधानमंत्री को राज्य के जातिवादी और सांप्रदायिक नेताओं के स्तर तक नीचे नहीं आना चाहिए।

बहरहाल, बिहार और उत्तर प्रदेश- इन दोनों राज्यों को अपने दो फेफड़ों की तरह समझता हूँ और दुख तो होता ही है, जब महसूस होता है कि इनमें इतनी गंदगी भर गयी है कि साँस लेना भी दूभर हो रहा है। इन दोनों राज्यों की राजनीति को कवर करते-करते खुद में बीमार महसूस करने लगा हूँ। इतनी मात्रा में जातिवाद और सांप्रदायिक उन्माद के रहते कोई राज्य कैसे तरक्की कर सकता है?

(देश मंथन, 25 फरवरी 2017)

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