रवीश कुमार, वरिष्ठ टेलीविजन एंकर :

आखिर कौन नहीं चाहता था कि कांग्रेस हारे। सीएजी रिपोर्ट और लोकपाल आंदोलन के वक्त दो साल तक कांग्रेस ने जिस अहंकार का प्रदर्शन किया क्या उसकी सजा मिलने पर जश्न नहीं होना चाहिए।

यह चुनाव इसलिए भी याद रखा जाना चाहिए कि जनता ने मुक्कमल सजा दी है। हर दीवार पर यह इबारत लिखी थी। कांग्रेस इस कदर लोगों की निगाह से उतर चुकी थी कि बीजेपी और संघ परिवार के आलोचक विश्लेषक भी बीजेपी को छोड़ कांग्रेस की धुनाई कर रहे थे। अब ऐसी स्थिति में कांग्रेस को सरकार बनाने में भूमिका लायक सीटें मिलतीं तो कैसी निराशा फैलती इसका अंदाजा नहीं किया जा सकता। तो जो निराश हैं वो अपनी इस कामयाबी पर तो खुश हो ही सकते हैं।

लोगों ने टीवी या किसी कृत्रिम लहर के प्रभाव में कांग्रेस को नहीं हराया है। यह जनादेश कांग्रेस को हराने का था। लोग अगर टीवी के असर में नहीं आते तो क्या कांग्रेस को वोट दे देते। मुझे तो कई बार लगता था कि बीजेपी इतना प्रचार ही क्यों कर रही है। यह जरूर है कि मीडिया के सुनियोजित इस्तमाल से बीजेपी ने एक मजबूत विकल्प के रूप पेश कर दिया। इस पेशगी में दिसंबर के महीने में उलझन आयी थी जब आम आदमी पार्टी की सरकार बनी थी मगर यह पार्टी मीडिया के बनाये मिरर इमेज में फँस गयी। शुद्धतावादी होने का इतना दबाव ओढ़ लिया कि अपनी सरकार छोड़ दी। उसके बाद पार्टी ने पूरे देश से खड़े होने का फैसला कर लिया। बिना ढाँचा और संसाधन के। उसके इस फैसले ने सहमी बीजेपी को फिर मौका दे दिया। पंजाब और दिल्ली छोड़ बनारस की लड़ाई प्रतीक से ज्यादा कुछ नहीं थी। (इसी ब्लाग http://naisadak.blogspot.in/ पर मेरा पुराना लेख है)

जनता यह चुनाव एक विकल्प के लिए लड़ रही थी। उसे समझ आ गया कि आप तैयार नहीं है। उसे एक विकल्प देना था। जनता कैसे सपा बसपा राजद वाजद पर भरोसा करती। क्या वही देखने के लिए जिससे वो कांग्रेस को बदलकर छुटकारा पाना चाहती थी। जरूर ध्रुवीकरण की सीमा रही होगी मगर एक सीमा से ज़्यादा नहीं। बिहार में लालू के पक्ष में मुस्लिम उभार की ख़बरों को जरूरत से ज़्यादा तवज्जों इसलिए दी गयी ताकि बीजेपी की तरफ़ रूझान को और धक्का दिया जा सके। रही सही कसर मीडिया ने मुस्लिम वोटों के अतिविश्लेषण से पूरा कर दिया। लेकिन यह सब तभी सफल हो रहा था जब सब कांग्रेस की हार देखने के लिए उतावले थे। 

बीजेपी और संघ अभूतपूर्व ऊर्जा और तैयारी के साथ संगठित थे। इनसे लड़ने के लिए मैदान में कोई प्रतिरोधी ढाँचा था ही नहीं। और अब बिना इस ढाँचे के अखबारों के एडिट पेज के सहारे इसे लड़ा भी नहीं जा सकता। कांग्रेस तभी सहारा बन सकती है जब बीजेपी कांग्रेस की तरह लचर हो जायेगी जो मुमकिन नहीं लगता। बीजेपी और संघ ने अभी तक अपने हर अंतर्विरोध का बेहतरीन प्रबंधन किया है। जहाँ उनकी सरकारें हैं वहाँ भी कोई भगदड़ नहीं है। मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ या राजस्थान। अब इस पार्टी को राज करना आ गया है। जब तक कोई नया विकल्प नहीं उभरेगा 'संघ सिस्टम' को विस्थापित करना फिलहाल असंभव जान पड़ता है। संघ सिस्टम क्या है उस पर भी आता हूँ।

इस चुनाव में विरोधी टीवी देखते रह गये। उनकी सारी आलोचना टीवी तक सीमित रह गयी। इसलिए वे वहाँ नहीं देख पाये जहाँ बीजेपी चुनाव लड़ रही थी। पार्टी से बाहर की संस्थाओं का भी सदुपयोग किया गया। रामदेव, गायत्री परिवार और श्री श्री रविशंकर की संस्थाओं ने भी कई स्तरों पर मतदाताओं को संगठित किया। संघ सिस्टम में इन संस्थाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। रामदेव या श्री श्री रविशंकर जैसे धार्मिक या गैर राजनीतिक स्पेस से बाहर के लोगों की संस्थाएँ भी काफी पेशेवर हैं। इस लिहाज से संघ सिस्टम धार्मिक और पेशेवर का अच्छा मिश्रण है। मोदी की इस जीत में संघ सिस्टम को उदय का भी अलग से आंकलन किया जाना चाहिए। हिन्दुत्व को व्यक्त करने के अलग अलग रूप हैं। हर संस्था इन रूपों की व्याख्या करते हुए अपने ग्राहकों के मन में मोदी को उतार रही थी। एक बीजेपी नेता ने बताया था कि बनारस में ही श्री श्री रविशंकर के सैंकड़ों कार्यकर्ता भीतरी प्रचार में लगे थे। दिल्ली में भी। विरोधी लहर गिन रहे थे और संघ सिस्टम बिना किसी झाँसे में आये एक एक मत का प्रबंधन कर रहा था। अगर कांग्रेस विरोधी लहर नहीं होती तब भी संघ सिस्टम अपने प्रचुर मानव संसाधन के दम पर मोदी को सत्ता में पहुँचा देता।

इस चुनाव ने संघ सिस्टम को चुनाव लड़ने की एक पेशेवर संस्था में बदल दिया है। मोदी ने तो चुनाव लड़ने का तरीका बदला ही लेकिन संघ सिस्टम के पेशेवर होने से उनकी ताक़त हजार गुना बढ़ गयी है। इस बात में कोई दम नहीं है कि बीजेपी को 21% ही मत मिले। बल्कि विरोधी फिर से कम आंककर जनादेश का अपमान कर रहे हैं। विरोध करना है तो इस सरकार के काम का इंतजार कीजिये। अंध विरोध और बिना वैकल्पिक सिस्टम के अखबारों के पन्ने तो भर लेंगे मगर नतीजा कुछ नहीं निकलने वाला। वो भी यह विरोध हिन्दी के स्पेस में कम अंग्रेजी के स्पेस में ज़्यादा हो रहा था। इस चुनाव में अंग्रेजी भी हारी है। कम से कम मैं तो इससे बहुत खुश हूँ इसलिए नहीं कि अंग्रेजी से नफरत है बल्कि इसलिए कि पूरी यूपीए सरकार अंग्रेजीयत में डूबी थी। बीजेपी का हर बड़ा नेता हिन्दी के शो में खुशी खुशी मौजूद होता था तो कांग्रेस के नेता अंग्रेजी चैनलों में अंग्रेजी बोल रहे थे जिन्हें अवाम नहीं देखती। इन नेताओं का हिन्दी के प्रति दोयम दर्जे का नजरिया होता था। 

बनारस में संस्कृति कर्मियों का एक मार्च निकला था। कुछ पर्चे निकाले थे। इनमें से एक पर्चा होटल के कमरे में पढ़ रहा था। किन्हीं सज्जन ने बहुत शोध के साथ तथ्य पेश किया था कि संघ का तिरंगे में यकीन और श्रद्धा नहीं है। मुझे हँसी आयी और रोना भी। जरूर किसी ने बीसवीं सदी के तीसरे चौथे दशक में यह बात कहीं होगी लेकिन क्या यह मुमकिन है कि आज कोई कह दे कि मोदी अब तिरंगे को बदल दें। दिल किया कि फोन करूँ और कह दूँ कि मेरी तरफ से लिखकर रख लीजिये। किसी संस्था की औकात नहीं है ऐसा करने की बात पब्लिक में कह दे। फिर सोचा अपनी पेशेवर हदों में ही रहें तो ठीक है। भय का माहौल बनाकर विरोध नहीं जीतता। विकल्प बता कर दावेदारी की जाती है। आलोचक कांग्रेस का विरोध कर रहे थे, बीजेपी का भी कर रहे थे और आम आदमी पार्टी का भी। कई बार लगता था कि वे इस चुनाव में मोदी विरोध के नाम पर राजनीतिक पुनर्जागरण करने निकले हैं। उनके विरोध का लाभ उठाने के लिए कोई ढाँचा नहीं था। मोदी हर तरह की चालबाजियाँ से लेकर यारबाजियाँ कर रहे थे और विरोधी शुद्धतावादी आदर्शवादी पुनर्जागरण।  इनसे तो अच्छे वो हैं जिन्होंने नोटा को वोट किया।

खैर अब जब हार हो गयी है तो हार मान लेनी चाहिए। राजनीति और संचार का बहुत ज्ञान तो नहीं है लेकिन इतना तो कह सकता हूँ कि विरोधी भाव और भाषा बदल लें। जनरेशन एक्स वाई जेड से बात करना सीख लें। विरोधियों का आपस में संवाद तो अच्छा है मगर जनता से बिल्कुल नहीं। मोदी का मामला ठीक उल्टा है। वे बहुत आसानी से मनमोहन की चुप्पी का विकल्प बन गये। कांग्रेस या मोदी विरोधी एक उदासीन राजनीति को अपने रंगीन कुर्तों से ऊर्जावान कर दिया।

मोदी का विरोध इसलिए न करें कि चिढ़ मचती है और खुद की प्रतिबद्धता साबित करनी है। जरूर करें मगर इस आत्मविश्वास के साथ कि मोदी की जीत सबकी जीत है। उनकी नीतियों की आलोचना गुण दोषों के आधार पर होगी न कि मोदी को बेंचमार्क बना कर। अगर ऐसा करते तो आज लोग भी उनकी बात सोचते और खुद से पूछते कि आखिर क्या बात है कि रघुवंश प्रसाद सिंह, अजय कुमार और योगेंद्र यादव जैसा नेता हार जाता है। कहाँ गये वो लोग जो राजनीति में अच्छे लोगों की तलाश में तड़प रहे थे। क्यों हर तीसरा सासंद आपराधिक पृष्ठभूमि का है। कहाँ गया वो ग़ुस्सा जो इन सवालों को लेकर उठा था। क्या वो गुस्सा लौटेगा या ये सवाल अगले बीस साल के लिए स्थगित हो चुके हैं। रामदेव गांधी और जेपी के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके हैं। अब भी किसी को संघ सिस्टम की कामयाबी और क्षमता में संदेह है तो उसे रोज कहना चाहिए कि मोदी हार गये हैं मगर प्रधानमंत्री कौन है यही पता नहीं!

(देश मंथन, 19 मई 2014)

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