संदीप त्रिपाठी

आमतौर पर दो प्रमुख दलों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनावी घमासान की रणभूमि रहे छत्तीसगढ़ में इस बार परिदृश्य बदला सा नजर आ रहा है। इस बार एक तीसरी राजनीतिक शक्ति पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जकांछ) इस चुनावी समर को तीसरा कोण देती नजर आ रही है।

निश्चित तौर पर चुनावी रणनीति के तहत दोनों प्रमुख पार्टियाँ जोगी की जकांछ को ज्यादा तवज्जो देती नहीं दिख रहीं। लेकिन मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से जकांछ के चुनावी गठबंधन के बाद इस तीसरे कोण के प्रभाव का आकलन जरूरी हो जाता है।

छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुए 18 वर्ष बीत चुके हैं। वहां तीन वर्ष कांग्रेस की सरकार रही और 15 वर्षों से भाजपा की सरकार है। अजीत जोगी कांग्रेस के एकमात्र ऐसे नेता रहे जिनकी प्रदेशव्यापी पहचान है। वर्ष 2016 में कांग्रेस ने अजीत जोगी को निष्कासित कर दिया जिसके बाद उन्होंने अपनी नयी पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ का गठन किया। इस नाते 2018 का विधानसभा चुनाव वह पहला चुनाव होगा जिसमें अजीत जोगी के स्वतंत्र राजनैतिक कद का फैसला हो पायेगा। हालाँकि छत्तीसगढ़ के दलित समाज पर अजीत जोगी का व्यापक प्रभाव माना जाता है। जोगी दलितों समुदायों की अगुवाई करने वाले सतनामी समाज का होने का दावा करते हैं।

छत्तीसगढ़ में आधे से ज़्यादा आबादी आदिवासियों की है। बहुसंख्यक होने के बावजूद आदिवासी राजनीति में हाशिये पर ही रहे है। छत्तीसगढ़ की कुल आबादी 2 करोड़ 55 लाख 45 हजार 198 है। जातिगत जनगणना 2011 के मुताबिक छत्तीसगढ़ में हिन्दू 93.2 प्रतिशत, मुसलमान 2.01 प्रतिशत, इसाई 1.92 प्रतिशत, सिक्ख 0.27 प्रतिशत, बौद्ध 0.27 प्रतिशत, जैन 0.24 प्रतिशत और अन्य जातियाँ 1.93 प्रतिशत हैं। जबकि ओबीसी 48 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति (एसटी) 32 प्रतिशत, अनुसूचित जाति (एससी) 10-12 प्रतिशत और सामान्य वर्ग 8 से 10 प्रतिशत हैं।

90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा में पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 सीटों में से 9 सीटें भाजपा को और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित 29 सीटों में से 18 सीटें कांग्रेस को मिली थीं। यानी इन कुल 39 आरक्षित सीटों में से 20 भाजपा को और 19 कांग्रेस को मिली थीं। इन वर्गों का इन आरक्षित सीटों के अलावा भी 21 सीटों पर अच्छा प्रभाव है। यानी सूबे की कुल 90 में से 60 सीटों हार-जीत का फैसला इन वर्गों के वोट से होता है।

वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 41.04 प्रतिशत (49 सीटें) और कांग्रेस को 40.29 (39 सीटें) प्रतिशत वोट मिले थे। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 40.33 प्रतिशत (50 सीटें) और कांग्रेस को 38.63 (38 सीटें) प्रतिशत वोट मिले थे। वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 39.26 प्रतिशत (50 सीटें) और कांग्रेस को 36.71 (37 सीटें) प्रतिशत वोट मिले थे। इनतीनों विधानसभा चुनाव में बसपा को क्रमश: 4.27 प्रतिशत (1 सीट), 6.11 प्रतिशत (2 सीट) और 4.45 प्रतिशत (2 सीट) वोट मिले थे। इसके अलावा गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) को क्रमश: 1.57 प्रतिशत, 1.59 प्रतिशत और 1.60 प्रतिशत वोट मिले थे हालांकि सीट कोई नहीं मिली थी।

अजीत जोगी की रणनीति अपनी राज्यव्यापी पहचान और ताकत के साथ बसपा की ताकत और गोंगपा के प्रभाव को मिला कर सूबे में सरकार बनाने की है। हालाँकि अभी गोंगपा का गठबंधन जोगी और बसपा के साथ घोषित नहीं हुआ है लेकिन जोगी की रणनीति में गोंगपा भी देर-सबेर शामिल हो सकती है। सूबे में आमतौर पर आदिवासी भाजपा और कांग्रेस दोनों से खुश नहीं दिख रहे। यानी जोगी और बसपा का गठजोड़ इस वर्ग के लिए एक मुफीद विकल्प हो सकता है। अनुसूचित जाति के वर्ग में खुद जोगी और बसपा की अलग-अलग पैठ है। अन्य वर्गों को लुभाने के लिए जोगी ने पाँच प्रतिज्ञाएं ली हैं जिनमें बेरोजगार, किसान, महिला और व्यापारी वर्ग के लिए लुभावने वादे हैं। जोगी अपनी विजय रथ यात्रा में इन पाँचों प्रतिज्ञाओं को जोर-शोर से प्रचारित कर रहे हैं। हालाँकि जकांछ के कई नेताओं के कांग्रेस में लौटने से जोगी को झटका लगा है लेकिन जोगी को उम्मीद है कि कांग्रेस-भाजपा का टिकट वितरित होने के बाद उन दलों में उठा-पटक होगी जिसका फायदा जकांछ को मिलेगा। लब्बोलुआब यह कि छत्तीसगढ़ में जोगी का गठबंधन कांग्रेस-भाजपा का खेल बिगाड़ने की स्थिति में तो पहुँच ही गया है। किस्मत साथ रही तो कब कौन कर्नाटक का कुमारस्वामी बन जाये, यह किसे पता?

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