संदीप त्रिपाठी

बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन में सीटों के बंटवारे पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दरअसल पिछले चुनाव में महागठबंधन का हिस्सा बन कर लड़ने वाली जदयू के गठबंधन से निकल जाने के बाद अब शेष बड़े दल राजद और कांग्रेस इस बार ज्यादा-से-ज्यादा सीटें अपने पास रखने के पक्ष में हैं।

इसका भान होते ही हिंदुस्‍तानी अवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतनराम मांझी अलग हो चुके हैं। मांझी की खुली बगावत और उनके एनडीए में जाने तक विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के मुकेश सहनी मांझी के साथ थे। सहनी के लिए यह महत्वपूर्ण था कि महागठबंधन में छोटी पार्टियाँ बनी रहें। इससे छोटी पार्टियाँ मिल कर बड़ी पार्टियों पर दबाव बना सकती थीं। लेकिन माँझी के सीट बँटवारे पर बात होने से पहले ही अलग होने से छोटी पार्टियाँ मोल-भाव में थोड़ी कमजोर पड़ी हैं।

छोटी पार्टियों की बड़ी माँग

बड़े दिनों तक इशारों में अपना माहौल बनाने के बाद अब महागठबंधन की छोटी पार्टियों ने खुल कर अपनी माँगें सामने रख दी हैं। महागठबंधन में छोटी पार्टियों के रूप में उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा, मुकेश सहनी की वीआईपी, भाकपा माले (लेनिन), भाकपा और माकपा शामिल हैं। इसमें रालोसपा 49 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जबकि वीआईपी 25 सीटें माँग रही है। भाकपा और माकपा मिलकर 45 सीटें माँग रही हैं, जबकि भाकपा-माले (लेनिन) अकेले 50 सीटें माँग रही है। पर राजद के तेजस्वी यादव इन छोटे दलों की ऐसी माँगों को तवज्जो देने को तैयार नहीं हैं।

69 प्रतिशत सीटों पर छोटी पार्टियों का दावा

बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं। महागठबंधन में शामिल छोटी पार्टियाँ इसमें से 169 सीटों यानी 69.54 प्रतिशत पर दावा कर रही हैं। इसीलिए राजद और कांग्रेस इन पार्टियों को बहुत तवज्जो देने के मूड में नहीं हैं। रालोसपा और वीआईपी पर राजद का मानना है कि लोकसभा चुनाव में इन्हें महत्व दिया गया, लेकिन ये दोनों पार्टियाँ अपनी जातियों का वोट भी ट्रांसफर करने में समर्थ नहीं रहीं।

इसके अलावा एक बात और है। महागठबंधन में से जदयू के निकलने से वे 101 सीटें खाली हुई हैं, जिन पर पिछले विधानसभा चुनाव में जदयू लड़ी थी। राजद चाहती है कि नयी स्थिति में वह पिछली बार के मुकाबले डेढ़ गुना सीटों पर लड़े। यही कांग्रेस भी चाहती है।

राजद पिछली बार 101 सीटों पर लड़ी थी। कांग्रेस ने 41 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। अब राजद 150 सीटों पर और कांग्रेस 60 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है। ऐसे में छोटी पार्टियों के लिए गठबंधन में गुंजाइश कुल मिला कर 33 सीटों की बनती है।

यदि राजद और कांग्रेस छोटी पार्टियों को महागठबंधन में रोकने के लिए थोड़ा पीछे भी हटती हैं तो भी हद से हद 50 सीटों की ही गुंजाइश बनेगी। ऐसे में ‘सम्मानजनक’ सीटों की छोटी पार्टियों की माँग को पूरा करना संभव नहीं है।

पिछले विधानसभा चुनाव में क्या थी स्थिति

जब छोटी पार्टियाँ सम्मानजनक सीटों के नाम पर 69 प्रतिशत सीटों पर दावा कर रही हों, तो यह देखना समीचीन है कि पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी क्या स्थिति थी। पिछले चुनाव में कुशवाहा की रालोसपा एनडीए का हिस्सा थी और 23 सीटों पर लड़ी थी। वह दो सीटें जीत पायी थी, एक सीट पर जमानत जब्त हुई थी और राज्य में कुल डाले गये वोटों में उसे 2.56 प्रतिशत वोट मिले थे।

भाकपा-माले (लेनिन) पिछली बार अकेले 98 सीटों पर लड़ कर 3 सीटें जीती थी। 93 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हुई थी और उसे कुल 1.54 प्रतिशत वोट मिले थे। भाकपा भी 98 सीटों पर लड़ी। उसे कहीं जीत नहीं मिली और 96 सीटों पर जमानत जब्त हुई। राज्य में उसे कुल 1.36 फीसदी वोट मिले। माकपा 43 सीटों पर लड़ी थी और केवल एक सीट पर अपनी जमानत भर बचा पायी थी। उसे कुल 0.61 फीसदी वोट मिले थे।

इसके मुकाबले राजद 101 सीटों पर लड़कर 80 सीटें जीती थी और उसे 18.35 फीसदी वोट मिले। कांग्रेस 41 सीटों पर लड़ कर 27 सीटें जीती थी और उसे 6.66 प्रतिशत वोट मिले थे। वीआईपी का पिछले विधानसभा चुनाव में कोई अस्तित्व नहीं था।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में इन छोटी पार्टियों में से भाकपा-माले को 1.4 फीसदी, भाकपा को 0.7 फीसदी और माकपा को 0.1 फीसदी वोट मिले थे। रालोसपा को 3.7 फीसदी और वीआईपी को 1.7 फीसदी वोट मिले थे। यानी पिछले विधानसभा में इन पाँच छोटी पार्टियों को मिलाकर 6.07 फीसदी वोट मिले थे, जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में इन्हें कुल 7.6 फीसदी वोट मिले थे।

अब राजद के रुख पर नजरें

कुल मिला कर छोटी-छोटी पार्टियों को मिला कर महागठबंधन बनाना अब राजद के लिए दिक्कत का सबब बन रहा है। छोटी पार्टियों को कुल मिला कर मिलने वाले 6-7 प्रतिशत वोट कुछ खास इलाकों तक सीमित हैं। जाहिर है, उन इलाकों में ये छोटी पार्टियाँ खुद लड़ेंगी।

शेष जगह जहाँ उनका प्रभाव नहीं है, वे महागठबंधन का समर्थन करेंगी जिससे राजद और कांग्रेस को कोई लाभ होता नहीं दिख रहा। बताया जाता है कि राँची जेल में बैठे लालू प्रसाद यादव भी इन दलों को बहुत तवज्जो देने के पक्ष में नहीं हैं।

दरअसल, महागठबंधन के लिए ये छोटी पार्टियाँ जीत में मददगार होने की बजाय विपक्ष के लिए एक मनोवैज्ञानिक दबाव के मतलब की ज्यादा हैं।

(देश मंथन, 7 सितंबर 2020)

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