कौन चुनता है प्रधानमंत्री? सांसद, या जनता?

राजीव रंजन झा : 

इस देश की जनता सांसद चुनती है, प्रधानमंत्री नहीं। 

यही संविधान है ना!

मोदी के भोपाल भाषण से स्पष्ट होते चुनावी मुद्दे

संदीप त्रिपाठी

एकात्म मानववाद के सूत्रधार पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भोपाल के जंबूरी मैदान में कार्यकर्ता कुंभ में अपने 40 मिनट के भाषण के साथ मध्य प्रदेश में भाजपा का चुनावी शंखनाद कर दिया। साथ ही न सिर्फ मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव बल्कि छत्तीसगढ़, राजस्थान विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भी अपना चुनावी एजेंडा साफ कर दिया। आइये, देखते हैं मोदी के भाषण का सार क्या है?   

प्रधानमंत्री कौन चुनेगा, देश की जनता या पाक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषण में कहते हैं कि देश में गठबंधन करने में विफल रही कांग्रेस अब बाहर गठबंधन तलाश रही है। यह देश में गठबंधनऔर बाहर गठबंधन का इशारा बसपा के साथ कांग्रेस के गठबंधन की बात खटाई में पड़ने और पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री रहमान मलिक द्वारा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाये जाने के समर्थन में किये गये ट्वीट की ओर है। मोदी बसपा से बातचीत टूटने को कांग्रेस के अहंकार से और पाकिस्तानी पूर्व मंत्री के ट्वीट को कांग्रेस के डर से जोड़ते हैं। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि अब बाहर के देश तय करेंगे कि भारत का प्रधानमंत्री कौन हो। साफ है कि भाजपा कांग्रेस के अहंकार और उसे पाकिस्तानी समर्थन को मुद्दा बनाने जा रही है।

आम आदमी बनाम वंशवाद

प्रधानमंत्री ने एक बार फिर स्वयं को 'चाय वाला' की संज्ञा देते हुए कहा कि कांग्रेस को एक चाय वाले का प्रधानमंत्री बनना और 'गरीब मां के बेटे' शिवराज सिंह चौहान और योगी आदित्यनाथ का कुर्सी पर बैठना मंजूर नहीं है। कांग्रेस का मानना है कि कुर्सी पर केवल एक खानदान के लोगों को बैठने का हक है।अपने संबोधन के अंत में मोदी ने कहा कि विरोधी जितना कीचड़ उछालेंगे, उतना 'कमल' खिलता जायेगा। स्पष्ट है कि राहुल और मोदी के बीच का वंशवाद बनाम आम आदमी का मुद्दा अभी चलेगा।

विकास कार्यों के आड़े है कांग्रेस

मोदी ने कांग्रेस पर विकास कार्यों के आड़े आने का आरोप लाते हुए कहा कि कांग्रेस नीत यूपीए के शासनकाल में उन राज्यों को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा, जहाँ भाजपा सरकार थी। यूपीए सरकार भाजपा की प्रदेश सरकारों के प्रति दुश्मनी का भाव पाल कर बैठी थी। श्री मोदी ने कहा कि ऐसे षड्यंत्रों से राज्यों को बचाने के लिए उसके जिम्मेदारों को सजा मिलनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्र में उनकी सरकार और प्रदेश में श्री चौहान की सरकार ने प्रगति प्रदान की है। आने वाले पांच साल के लिए उसे आगे बढ़ाने के लिए हमें सेवा का मौका चाहिए। यानी भाजपा जो विकास कार्य करा पायी उसका श्रेय लेगी और जो नहीं करा पायी, उसके लिए कांग्रेस को निशाने पर रखेगी।

वैचारिक समन्वय का एजेंडा

मोदी जिस तीसरी बात पर जोर देते हैं, वह है समन्वय। मोदी अपने भाषण में महात्मा गाँधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का समन्वय करते नजर आते हैं और कहते हैं कि राष्ट्र के विकास और कल्याण के लिए इनके विचारों के बिना आप नहीं चल सकते। उन्होंने दूसरे दलों को नसीहत देते हुए कहा कि भाजपा को तीनों मंजूर हैं, क्योंकि उनकी पार्टी समन्वय में विश्वास रखती है। यहाँ मोदी ने बहुत जबरदस्त दूरगामी राजनीति खेली है जो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को कई अन्य दलों का साथ दिलाने में सहायक होगी।

बराबरी पर आधारित समाज

श्री मोदी ने एससी-एसटी ऐक्ट का उल्लेख किये बिना कहा कि अगड़े-पिछड़े में भेद देश का भला नहीं करेगा। देश की प्रगति में कोई वर्ग पीछे नहीं छूटे, हर वर्ग आर्थिक, सामाजिक रूप से सक्षम हो, इसलिए हम योजनाएँ बना रहे हैं। सबका साथ, सबका विकास के पीछे भी यही विचार है। उन्होंने कहा कि वोटबैंक की राजनीति ने समाज को दीमक की तरह तबाह कर दिया है। इससे देश को मुक्त कराना भाजपा की जिम्मेदारी है। यहाँ मोदी सबका साथ-सबका विकास के नारे के सहारे एससी-एसटी ऐक्ट पर सवर्णों में उत्पन्न नाराजगी को कुरेदे बिना उन्हें साथ रखना चाहती है।

संगठन में शक्ति है

श्री मोदी ने कार्यकर्ताओं का आह्वान करते हुए कहा कि चाहे जातिवाद का जहर फैले या नोटों के ढेर लग जायें, पर कार्यकर्ता प्रण करें कि वे पार्टी का ध्वज नहीं झुकने देंगे। पार्टी धन-बल से नहीं, जन-बल से चुनाव लड़ती है, कार्यकर्ता 'मेरा बूथ-सबसे मजबूत' के मंत्र को लेकर आगे बढ़ें।इस अवसर पर वहाँ मौजूद लाखों कार्यकर्ताओं की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पास ऐसे समर्पित कार्यकर्ता कहाँ हैं। मेरा बूथ-सबसे मजबूत नारा बताता है कि चुनावी वैतरणी पार करने के लिए उपरोक्त सभी मुद्दों के ऊपर एकजुट और कर्मठ कार्यकर्ता की रणनीति भाजपा और मोदी के लिए ब्रह्मास्त्र होगी।

(देश मंथन, 25 सितंबर, 2018)

मानवेंद्र की बगावत से मारवाड़ की 43 सीटों पर भाजपा मुश्किल में

संदीप त्रिपाठी

भाजपा के शिखर पुरुष माने जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में संकटमोचक हनुमान रहे और भाजपा के संस्थापक सदस्य जसवंत सिंह जसोल के पुत्र भाजपा विधायक मानवेंद्र सिंह जसोल का पार्टी छोड़ना भाजपा के लिए बड़ा झटका तो नहीं, लेकिन हाँ! बड़ा नुकसान जरूर है। झटका इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले साढ़े चार साल से पार्टी उनके साथ जो बर्ताव कर रही थी और जिस तरह उनकी उपेक्षा की जा रही थी, उसकी तार्किक परिणति यही थी। तो कहीं न कहीं यह माना जा सकता है कि पार्टी के कुछ बड़े यह चाहते थे कि मानवेंद्र भाजपा छोड़ें। यह बात दीगर है कि इन कुछ बड़ों की इस चाहत के पूरे होने से होने वाले नुकसान की भरपाई का स्रोत मिलने तक इस घटनाक्रम को रोकने की कोशिश की जा रही थी।

साढ़े चार वर्ष से उपेक्षित रहे मानवेंद्र

राजस्थान के बाड़मेर जिले की शिव विधानसभा सीट से भाजपा विधायक मानवेंद्र सिंह जसोल राजपूत समुदाय से हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पिता जसवंत सिंह के बागी प्रत्याशी बनने के बाद से मानवेंद्र सिंह पार्टी में उपेक्षित हैं। मानवेंद्र सिंह ने इस बाबत नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक से बात की, सब जगह सहानुभूति मिली लेकिन साढ़े चार साल का वक्त बीतने पर भी कोई कदम नहीं उठाया गया। दरअसल वसुंधरा मानवेंद्र सिंह को कोई तवज्जो देने को कतई तैयार नहीं थीं। और आलाकमान राजस्थान में वसुंधरा के आगे बेबस दिखता है।

नाकाम हुईं मनाने की कोशिशें

आखिरकार वही हुआ जो होना था। मानवेंद्र सिंह ने बाड़मेर के पचपदरा में 22 सितंबर को स्वाभिमान रैली घोषित कर दी और इस रैली को सफल बनाने के लिए वे और उनकी पत्नी चित्रा सिंह पूरे मारवाड़ में जनसंपर्क करने लगे। उन्हें बढ़िया जनसमर्थन भी मिलने लगा। तब जाकर भाजपा आलाकमान के कान खड़े हुए और मारवाड़ क्षेत्र के ही एक राजपूत नेता केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को मानवेंद्र सिंह को मनाने के लिए लगाया गया। मानवेंद्र सिंह को मनाने के लिए भाजपा ने बाड़मेर के जिला अध्यक्ष जालम सिंह रावलोत को हटाकर मानवेंद्र सिंह के करीबी दिलीप पालीवाल को जिलाध्यक्ष बना दिया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थीं। यहाँ तक कि स्वाभिमान रैली से पूर्व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की फोन पर की गयी बातचीत भी बेकार गयी।

राजपूत समाज हो रहा एकजुट

स्वाभिमान रैली में मानवेंद्र सिंह ने भाजपा में शामिल होने को अपनी भूल बताया और भाजपा से नाता तोड़ लिया। रैली में करणी सेना के अध्यक्ष और एनकाउंटर में मारे गये आनंदपाल सिंह की माँ भी मौजूद थीं। इसका अर्थ है कि पूरे प्रदेश में करीब सात प्रतिशत की आबादी वाला राजपूत समुदाय भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहा है। मानवेंद्र सिंह के भाजपा छोड़ने का असर महज मारवाड़ क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसके राज्यव्यापी असर की गुंजाइश है।

कांग्रेस में शामिल होने पर अह-जह

स्वाभिमान रैली में कांग्रेस के पक्ष में और वसुंधरा-भाजपा के खिलाफ नारे लगे लेकिन मानवेंद्र ने कांग्रेस में शामिल होने की बाबत इतना ही कहा कि स्वाभिमान रैली के समर्थक जो कहेंगे, वही निर्णय किया जायेगा। बताया जा रहा है कि अलवर के कुँवर जितेंद्र सिंह के मार्फत मानवेंद्र सिंह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के संपर्क में हैं लेकिन कांग्रेस का अशोक गहलोत धड़ा मानवेंद्र के कांग्रेस में शामिल होने के खिलाफ है। दरअसल मानवेंद्र सिंह शिव विधानसभा से पत्नी चित्रा सिंह को लड़ाना चाहते हैं और बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र से अपनी पसंद का टिकट चाहते हैं।

43 सीटों में 39 पर जीती थी भाजपा

मारवाड़ में जोधपुर संभाग के 6 जिलों - बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर, जोधपुर, पाली, सिरोही की कुल 33 सीट और नागौर जिले की 10 सीटों को मिलाकर कुल 43 विधानसभा क्षेत्र हैं। कभी कांग्रेस का गढ़ रहे मारवाड़ में पिछले चुनाव में भाजपा ने 39 सीट जीत कर इस गढ़ को ढहा दिया। कांग्रेस के खाते में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सीट समेत महज तीन सीट आयीं जबकि एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया था।

राजपूत, मुस्लिम समेत कई जातियों पर मानवेंद्र का असर

इस इलाके में 12 प्रतिशत राजपूत हैं जिन पर जसोल परिवार का अच्छा प्रभाव है। इसके कारण राजपूतों से जुड़ी राजपुरोहित, चारण, प्रजापत और अन्य पिछड़ी जातियाँ भी जसोल परिवार के प्रभाव क्षेत्र में हैं। एक और महत्वपूर्ण कोण यह है कि बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र में 20 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है जो जसोल परिवार के समर्थक है। इन मुस्लिमों में अधिकांश परिवारों के रिश्तेदार पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में हैं। जसवंत सिंह ने ही हिंगलाज यात्रा में इन सिंधी मुसलमानों का दर्द समझा था और उन्हें जोड़ने के लिए थार एक्सप्रेस चलवायी थी। अब मानवेंद्र सिंह के भाजपा छोड़ने से इन तमाम जातियों के भाजपा से विमुख होने के आसार हैं। अब मानवेंद्र सिंह का चाहे जो हो, भाजपा की चुनावी डगर काँटों भरी तो हो ही गयी है।

(देश मंथन, 24 सितंबर, 2018)

छत्तीसगढ़ में जोगी बनेंगे किस्मत के कुमारस्वामी!

संदीप त्रिपाठी

आमतौर पर दो प्रमुख दलों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनावी घमासान की रणभूमि रहे छत्तीसगढ़ में इस बार परिदृश्य बदला सा नजर आ रहा है। इस बार एक तीसरी राजनीतिक शक्ति पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जकांछ) इस चुनावी समर को तीसरा कोण देती नजर आ रही है।

बिहार से अलग नतीजे क्यों रहे उत्तर प्रदेश चुनाव के?

राजीव रंजन झा : 

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में प्रचार, मतदान और मतगणना तक के समूचे दौर में लोगों को बार-बार बिहार चुनाव भी याद आता रहा। 

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