संजय सिन्हा, संपादक, आजतक :

जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब पता नहीं किसने मुझे बता दिया था कि जवाहर लाल नेहरू के कपड़े धुलने और प्रेस होने के लिए पेरिस भेजे जाते थे। मुझे यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ था किसी की कमीज की तह ठीक करने के लिए उसे दुनिया के उस शहर में भेजा जाता है, जहाँ आइफिल टॉवर है। मुझे आज भी नहीं नहीं पता कि ऐसी बातें कितनी सच या झूठ होती हैं, पर उन दिनों मुझे पूरा विश्वास था कि यही सच है।

जवाहर लाल नेहरू सुबह कुर्ता उतार कर गंदे कपड़ों की बाल्टी में फेंकते होंगे, खुद नल के नीचे खड़े हो कर छपाछप नहाते होंगे और जैसे ही बाहर आते होंगे, उनकी माँ बाल्टी से कुर्ता निकाल कर पेरिस भेज देती होंगी।
मुझे नहीं पता था कि पेरिस कितना दूर है। गंदे कपड़ों की बाल्टी, नल के नीचे खड़े हो कर छपाछप करने वाली बात मुझे किसी ने बताई नहीं थी, यह मैंने खुद से अंदाजा लगाया था। मैं भी अपने कपड़े नहीं धोता था। कपड़े बाल्टी में फेंक कर नल के नीचे घंटों बैठा रहता। कभी पानी की धार को पकड़ने की कोशिश करता, कभी वहीं बैठे-बैठे पावर हाऊस बनाता। जब किसी ने बता दिया कि पेरिस जाने के लिए पानी वाले जहाज में बैठना पड़ता है तो मैं कागज की नाव बना कर भी बाथरूम में ले जाने लगा था।
माँ बाहर से आवाज देती रहती, “संजू, पानी मत बर्बाद करो।” पर संजू तो कब का पेरिस पहुँच चुका होता था।
***
मैंने इस बात की सत्यता कभी जाँचने की कोशिश नहीं की। पर बड़े होने पर भी एकाध लोगों से नेहरू जी के कपड़ों की धुलाई पर चर्चा हुई, तो किसी से साफ-साफ न ना कहाँ, न हाँ। और सबसे बड़ी बात तो ये कि किसी ने मेरी बात सुन कर अपनी भौंहें नहीं सिकोड़ीं। मतलब सबने यह सच्ची-झूठी कहानी सुन ही रखी होगी।
खैर, मुझे इसकी सच्चाई में नहीं जाना था, नहीं गया। सवाल कपड़े धुलने का नहीं था। कपड़े तो किसी के कहीं भी धुल ही सकते हैं। पर एक आदमी ने खुद के विषय में तय किया कि उसके कपड़े संसार में सबसे अलग धुलेंगे। मतलब कुर्ता धुलने के लिए दिल्ली से पेरिस जाएगा। कुर्ता दिल्ली से पेरिस गया होगा, तभी तो कहानी बनी। दिल्ली का कुर्ता अगर दिल्ली में ही धुलता, तो क्या संजय सिन्हा की कमीज धुलने की कहानी भी न बनी होती?
जनाब, कहानियाँ उन्हीं की बनती हैं, जिनकी जिन्दगी में कुछ अलग होता है। कुछ अलग उन्ही की जिन्दगी में होता है, जिनकी कहानियाँ बननी होती हैं।
अब आप सोच रहे होंगे कि इतनी पहेलियाँ बुझाने के पीछे आखिर मेरा मकसद क्या है?
बिल्कुल सही सोच रहे हैं। मेरा मकसद है आपको यह बताना कि चार दिनों से मैं बीमार क्या पड़ा, इस बार मेरा इलाज भी आस्ट्रेलिया से होने लगा है। अब आप चाहें तो अपने बच्चों को ये कहानी सुनाइएगा कि रिश्तों के बाबा संजय सिन्हा को जरा सर्दी हुई, सिर में दर्द हुआ, बुखार हुआ, तो उनका इलाज आस्ट्रेलिया से होने लगा। वो भी तब, जब वो दिल्ली में अपने घर में पड़े रहे।
***
अब नो फालतू बात। सीधे-सीधे मुद्दे की बात।
दो साल पहले मैं आस्ट्रेलिया गया था। वहाँ अपने फेसबुक परिजन डॉक्टर दीपक राय से मुलाकात हुई थी। फिर दीपक पिछले साल सपरिवार दिल्ली आए तो उनसे यहाँ भी मिलना हुआ। कल जब मैंने तबीयत खराब होने पर पोस्ट डाली तो अचानक डॉ. दीपक ने सिडनी से फोन किया। उन्होंने हालचाल पूछा। मैंने सारी बात बताई। फिर उन्होंने डॉक्टर की लिखी दवाओं के विषय में पूछा। मैंने पूरी पर्ची पढ़ कर फोन पर सुना दी।
उन्होंने कहा कि दवा ठीक दी जा रही है। बस एक दवा ऐसी है, जिसे आप दिन में मत लीजिएगा। उससे नींद बहुत आएगी, आप परेशानी महसूस करेंगे।
बात सही थी। उस दवा को लेते ही सुस्ती छाने लगती थी।
मैंने डॉक्टर दीपक की बात मान ली। उस दवा को छोड़ कर बाकी सारी दवाएँ लीं।
हालाँकि दोपहर में मैंने अपने दिल्ली वाले डॉक्टर को फोन किया और उसे पूरी बात बताई। डॉक्टर ने कहा कि आप चाहें तो वो दवा न लें। ये सच है कि उससे नींद आएगी, पर उसमें बुखार और सर्दी दोनों को ठीक करने का कॉम्बिनेशन है। पर आप उसकी जगह कालपोल या क्रोसिन से काम चला सकते हैं।
देर शाम डॉक्टर दीपक का फिर सिडनी से फोन आया। उन्होंने हाल-चाल पूछा।
मैंने दिन भर की रिपोर्ट दी। फिर उन्होंने कहा कि एसी का टेंपरेचर थोड़ा बढ़ा कर सोइएगा। मतलब टेंपरेचर 24 डिग्री के आसपास कर लीजिए। और हाँ नाक में दो बूँद ये वाली दवा भी डाल लीजिएगा।
***
रात भर चैन से सोया। फोन महाराज को पत्नी ने ही साइलेंट मोड पर कर दिया था, ताकि न बजेगी घंटी, न जगूंगा मैं।
अब नींद खुली है, तो लग रहा है नेहरू जी के कपड़े भले धुलने या प्रेस होने पेरिस गये हों या नहीं गये हों, पर संजय सिन्हा का इलाज सिडनी से चल रहा है।
और चले भी क्यों नहीं?
जिसका जितना बड़ा परिवार, उससे उतने लोगों को प्यार।
आप सबका दिल से धन्यवाद। आप लोगों ने मेरे लिए दुआ माँगी। मैं आज 79% ठीक हूँ। आज भर अगर आराम किया तो समझिए, कल से फिर चहकने लगूंगा।
(देश मंथन, 25 मई 2016)

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