सुंदर अय्यर : 

कोई भी कठिन समय बहुत कष्ट देता है, लेकिन जाते-जाते कुछ सिखा भी जाता है हमें। कोरोना भी कुछ ऐसा ही कर जायेगा। हालाँकि अभी यह गया नहीं है। जानकारों की मानें तो यह अभी और दर्द देकर जायेगा। जायेगा तो है ही, आज नहीं तो कल। लॉकडाउन ही सबसे आसान तरीका है इस घड़ी से निपटने का। हो सकता है इस लॉकडाउन से ऊब भी होने लगी हो। 

लेकिन इसकी अच्छाई देखें, खुद के साथ ऐसा स्वर्णिम समय बार-बार नहीं मिलता। कोरोना तो चला ही जायेगा, लेकिन जाते-जाते बहुतों की जिंदगी अलग-अलग तरीके से बदल भी जायेगा। सो आने वाले समय से कैसे निपटना है, उसकी तैयारी भी करने का यही समय है। देश की वित्तीय राजधानी में तो इस तबाही का मंजर सबसे भयावह है और चूँकि यह वित्तीय राजधानी है, लिहाजा देश की वित्तीय सेहत पर भी सबसे ज्यादा यही असर डाल सकती है। 

यह कोरोना अपनी विदाई के बाद भी हमें किस तरह या कितना रुलायेगा, यह सबसे अहम् सवाल होगा। यह हमारे जीवन को कितना बदल गया होगा, समय ही बतायेगा। गौर करें तो साफ समझ में आता है कि सामाजिक तौर पर तो जो प्रभाव पड़ेगा वो तो है ही, लेकिन हमारी व्यक्तिगत अर्थव्यवस्था में भी कई छेद छोड़ जायेगा यह कोरोना। 

विश्व भर में आर्थिक गतिविधियाँ ठप पड़ी हैं। कई विकाशशील देश अपने कर्ज चुका न पाने के कारण कंगाली की कगार पर खड़े हैं। तेल उत्पादन करने वाले रईस देश समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इस तेल का वो क्या करें। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता और न है। लेकिन मौजूदा हालात देखें तो अब भी गनीमत है। हमारे हाल उतने बुरे नहीं है। लेकिन वापस पटरी पर आने का तक का समय कितना भारी पड़ेगा, यह कहना मुश्किल है।

नौकरियाँ जानी शुरू हो चुकी हैं। कई बड़ी कंपनियाँ तो शायद इस झटके को बर्दाश्त कर लें, लेकिन छोटी और मँझोली कंपनियों के लिए इस बंदी के दौरान कर्मचारियों को वेतन देना भी भारी पड़ जायेगा। कई नवांकुर (स्टार्टअप) तो हो सकता है अपनी दुकान समेटने पर मजबूर हो जायें। हालाँकि सरकार ने एमएसएमई के लिए पैकेज की घोषणा की है, जिससे कि कम-से-कम वेतन बाँटने का संकट फिलहाल टल सके। छोटे और खुदरा व्यापारियों के लिए भी अस्तित्व का संकट होगा। जाहिर है कमाई बंद होगी तो खर्चों में भारी कटौती करनी होगी। 

फिल्म, मल्टीप्लेक्स, मॉल, पब, रेस्टोरेंट-होटल में खाना, यानी जहाँ भी ज्यादा लोगों के आने की गुंजाइश होगी, वहाँ जाने से कुछ समय तक जरूर लोग कतरायेंगे। जरूरत वाले खर्च ज्यादा होंगे, लक्जरी शायद कम हो। आदतें बदलेंगी, कुछ स्वत: तो कुछ मजबूरी में। लोग इन जगहों पर नहीं जायेंगे तो ये सारे ही धंधे प्रभावित होंगे। यात्रा और पर्यटन का भी भट्ठा बैठेगा, हॉलिडे पैकेज ऐसे ही डिब्बे में बंद पड़े रहेंगे। 

विदेश की सैर तो भूल ही जाइए कुछ समय। छोटी-मँझोली टूर और ट्रैवल कंपनियों के लिए अपना अस्तित्व बनाये रखना मुश्किल होगा। एयर बीएनबी जैसी कंपनी की हालत खराब है। अमेरिका में जिन लोगों ने कर्ज लेकर एयर बीएनबी के गेस्टहाउस बनाये, वे फँस गये हैं। भारत में हालाँकि एयर बीएनबी उस स्तर पर लोकप्रिय नहीं है, फिर भी यह एक नजीर भर है। 

ओला-ऊबर जैसी शेयर्ड इकोनामी वाले धंधे भी अलोकप्रिय होंगे। हालाँकि कोरोना का डर निजी कार रख सकने वालों को सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने से रोकेगा। हो सकता है कुछ समय के लिए बाइक और बजट कारों के बाजार में थोड़ा उत्साह देखने को मिले। लेकिन यह हिस्सा कितना होगा, कहना मुश्किल है। इसी से जुड़ा रियल एस्टेट भी है, जो पहले ही मंदी की गिरफ्त में था। अब उसके लिए कमर सीधी कर पाना और दुरूह होगा। सरकारी मदद इस क्षेत्र में कितनी कारगर हो पायेगी, कहना मुश्किल होगा। 

कोरोना के इस डर ने शहरों में बसे मजदूर वर्ग और बहुत सारे कर्मचारी वर्ग को वापस अपने गाँवों की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया। अब इनमें से कितने वापस इन शहरों में आयेंगे यह तो नहीं पता, लेकिन इन बड़े शहरों की अर्थव्यवस्था में इनका खासा योगदान रहा है। मजदूर नहीं मिले तो विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र का भगवान ही मालिक होगा। पर्याप्त कर्मचारी नहीं होंगे तो मौजूदा आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) को भी बरकरार रख मुश्किल होगा। 

कुछ बड़ी एफएमसीजी कंपनियाँ इस पलायन का असर देख रही हैं। उनके लिए इस आपूर्ति श्रृंखला को दुरुस्त रख पाना आसान नहीं होगा। कुछ का मानना है कि लॉकडाउन खुलने पर अगर खरीदारी में एक उछाल आयेगी तो उनके पास शायद पर्याप्त कर्मचारी न हों। वेयरहाउसिंग, वितरण वगैरह के लिए कर्मचारियों की कमी कहाँ से पूरी होगी? ऐसे में कुछ बड़े एफएमसीजी प्लेयर तकनीकी नव-प्रयोगों का सहारा ले सकते हैं, जैसा कि अमेजन जैसी बड़ी कंपनियों ने अमेरिका में वेयरहाउस ऑटोमेशन के जरिये शुरू किया है। 

लेकिन हर कठिन समय कुछ सिखा भी जाता है। वैयक्तिक दूरी (पर्सनल डिस्टेंसिंग) की यह धारणा हमारी आदतों को भी कुछ हद तक बदलेगी। हम डिजिटल इंडिया के और करीब होंगे। हम भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से कतरायेंगे, इसलिए ई-कॉमर्स और तेजी पकड़ेगा। इस लॉकडाउन ने हवा-पानी में इतना बदलाव ला दिया है कि जंगली जानवर जंगल से नजदीक के शहरों में दिखने लगे। चिड़ियों की चहचहाहट घर के अंदर तक सुनाई पड़ने लगी। ओजोन परत में सुधार आने लगा। शहरों की आबो-हवा में साँस लेना आसान हो गया। और तो और, खरबों खर्च कर जो न हो पाया वो होने लगा - गंगा के पानी का रंग बदलने लगा। 

यह बदलाव हमें स्वच्छता को लेकर और जागरूक करेगा। हम अपने स्वास्थ्य पर थोड़ा ज्यादा ध्यान देंगे। अपने खान-पान में संभव है कुछ बदलाव भी लायेंगे। कॉर्पोरेट जगत जहाँ भी संभव होगा, वहाँ घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) को और तवज्जो देगा। बैंकिंग में और बदलाव दिखेगा। स्वचालन (ऑटोमेशन) तो बढ़ेगा ही, मशीन लर्निंग और क्लाउड का इस्तेमाल बढ़ेगा। ऐसे क्षेत्रों में नये कुशल कामगारों की भी जरूरत होगी। 

यह भी सच है कि यह स्वचालन कर्मचारियों की जरूरत कम कर सकता है। लेकिन ऐसे मौके कुशल कामगारों के लिए नये अवसर का काम भी करते है, बशर्ते सरकार बाजार में अपेक्षित कौशल को पहचान कर अपनी योजनाओं के जरिये उनकी पर्याप्त मदद करे। सरकार गाँवों से वापस न लौटने का फैसला करने वाले मजदूरों-कर्मचारियों पर भी ध्यान दे। सब्सिडी देकर नहीं, बल्कि उन्हें तकनीकी तौर पर सक्षम बनाने में उनकी मदद करके। सहकारी कृषि (कोऑपरेटिव फार्मिंग) की कोशिशें समय-समय पर होती रही हैं। इस काम में बड़ी कंपनियों की मदद ली जा सकती है और इस क्षेत्र में नवांकुरों (स्टार्टअप) को प्रोत्साहित किया जा सकता है। महिंद्रा जैसी कंपनी ने इस ओर कुछ पहल भी की थी। 

कुछ भी कहना जितना आसान होता है, करना उतना ही मुश्किल। जब पूरा देश ऐसी आर्थिक मंदी की जकड़ में होगा तो सरकार की कमाई भी उतनी नहीं रह जायेगी। चाहे वह आयकर हो, या कॉर्पोरेट टैक्स, ऐसे में मदद के पैकेज का पैसा भी जुटाना सरकार के लिए उतना ही मुश्किल होगा। कच्चे तेल की बेतहाशा गिरती कीमतें हमारा ढेर सारा तेल बिल भी बचायेंगी, जो विदेशी मुद्रा में हमारा सबसे बड़ा खर्च है। ऐसी बचत का सही इस्तेमाल जरूरी होगा। 

पर हाँ, जब मंदी वैश्विक है तो विदेशों से घर भेजे जाने वाले भारतीयों का पैसा भी घटेगा ही। यही नहीं, विदेशी निवेशकों ने जो पैसा भारत में लगा रखा है वह भी फिलहाल तो वापस जायेगा ही। मार्च के आँकड़ों को देखें तो विदेशी पोर्टफोलिओ निवेशकों (एफपीआई) ने 1.12 लाख करोड़ रुपये का निवेश भारतीय बाजार से वापस निकाल लिया है। ज्यादातर देशों में तरलता (लिक्विडिटी या नकदी) का संकट तो है ही। इस सब का भी प्रतिकूल असर तो होना ही है। 

फिर भी आईएमएफ के वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के अप्रैल 2020 के आंकड़े बताते हैं कि इस सारी वैश्विक तबाही के बीच भी भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था की स्थिति औरों जितनी बुरी नहीं लगती। आईएमएफ के अनुसार 2020 में वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर -3% रहने का अनुमान है, यानी वैश्विक जीडीपी 3% कम हो जायेगी और यह स्थिति 2008-09 के वित्तीय संकट से भी बदतर होगी। आईएमएफ का अनुमान है कि अगर वर्ष के उत्तरार्ध में महामारी की स्थिति सुधरेगी और सरकारी नीतियों के दम पर जब आर्थिक गतिविधियाँ तेजी पकड़ेंगीं, तब 2021 में वैश्विक अर्थव्यवस्था में 5.8% की अनुमानित वृद्धि होगी। अगर 2020 में जीडीपी विकास दर के अनुमान देखें तो भारत की स्थिति सबसे बेहतर है। भारत में यह दर 1.9% अनुमानित है, जबकि चीन में 1.2% और बाकी के सभी प्रमुख देशों में तो नकारात्मक वृद्धि का आकलन है। इसे भारत के लिए एक अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। 

बड़े-बड़े देश इस समय चीन से अपना कारोबार हटाने की सोचने लगे हैं और भारत जैसे देशों के लिए यह एक बहुत बड़ा मौका है। चीन ने अपने देश में इतनी सहूलियतें दे रखी हैं कि कई विदेशी विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) संयंत्र वहाँ लगे हैं। लागत भी वहाँ कम आती है। लेकिन नये हालात में अब वे वहाँ से खिसकने का मन बना रहे हैं। जापान ने एक इसके लिए अरबों-खरबों का पैकेज भी तैयार कर डाला है। वह चीन से अपनी विनिर्माण इकाइयाँ हटाने वाली जापानी कंपनियों को भारी मदद करने का ऐलान कर चुका है, भले ही वे उस इकाई को हटा कर जापान में स्थापित करें या फिर चीन से बाहर किसी और देश में। 

हम खुद भी तो यह काम कर सकते हैं। हमारे पास श्रम-शक्ति भी है और लागत भी कम है। अब इस अवसर का कितना लाभ उठाया जा सकेगा, यह तो समय ही तय करेगा। पर इतना जरूर है कि इस संकट से निपट पाने में हम बहुतों से ज्यादा सक्षम हैं और इस घड़ी को हम जितनी जल्दी उलट पाएं उतना ही ज्यादा लाभ होगा। थोड़ी हमारी समझदारी, थोड़ी सरकार की हिस्सेदारी और दोनों की जिम्मेदारी, बस इतना ही जरूरी है। बाकी तो, अंत भला तो सब भला। 

(देश मंथन, 29 अप्रैल 2020)

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