क़मर वहीद नक़वी, पत्रकार :

अगर यह बात सच हो तो शायद यह UPA सरकार के दिनों का सबसे बड़ा घोटाला होगा! 'काली खेती' का घोटाला! लाखों अरब रुपये का घोटाला होगा यह। इतना बड़ा कि आप कल्पना तक न कर सकें! गिनतियों में उलझ कर दिमाग घनचक्कर हो जाये! छह सालों में यह छब्बीस करोड़ करोड़ रुपये का गड़बड़झाला है।

जी आपने बिलकुल सही पढ़ा। दो बार करोड़ करोड़। छब्बीस करोड़ करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम! यानी भारत की कुल जीडीपी के 16 गुना से भी ज्यादा बड़ी रकम का घोटाला? क्या सचमुच यह सम्भव है? और सम्भव है तो कैसे? और यह घोटाला कम से कम छह सालों तक तो चला ही। कौन जाने उसके बाद भी चला हो या शायद अब भी चल रहा हो? कह नहीं सकते। क्योंकि आँकड़े तो सिर्फ इतने साल के ही उपलब्ध हैं। आय कर के एक पूर्व अधिकारी विजय शर्मा ने RTI से प्राप्त जानकारी के आधार पर पटना हाइकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है कि इस पूरे मामले की जाँच हो।

Biggest ever Black Money Scam in India!

काले धन को सफेद करने की खेती!

अगर यह आँकड़ें सच और सही हैं, तो स्वतंत्र भारत के इतिहास में काले धन (Black Money) को सफेद करने का इतना बड़ा गोरखधन्धा पहली बार सामने आया है। अभी तक केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने या वित्त मंत्रालय ने इन आँकड़ों का खंडन नहीं किया है और वित्तमंत्री अरुण जेटली संसद में साफ इशारा भी कर चुके है कि सरकार एक बड़े घोटाले की जाँच कर रही है और बाद में यह न कहा जाये कि इसके पीछे राजनीतिक दुर्भावना है।

साल में 300 करोड़ रुपये कमाई वाली खेती?

यह गोरखधन्धा 'काली खेती' का है। 'काली खेती' मतलब काले धन को सफेद करने की खेती! क्योंकि कृषि से कमाई पर कोई आय कर नहीं लगता है। आँकड़ों को देखिए तो दिमाग का कचूमर निकल जायेगा। सिर्फ एक साल में यानी सिर्फ 2011 में छह लाख से ज्यादा लोगों ने करीब बीस करोड़ करोड़ रुपये की कृषि आय घोषित की! भारत की मौजूदा जीडीपी करीब 1.61 करोड़ करोड़ रुपये है। ऐसा कैसे हो सकता है कि एक साल में देश की जीडीपी के बारह गुने से भी ज्यादा की कमाई खेती से हो जाये मामूली-सा गणित कर लीजिए। बीस करोड़ करोड़ को 656944 (कृषि आय घोषित करने वालों की कुल संख्या) से भाग दीजिए। उत्तर मिलेगा 304 करोड़ रुपये! यानी इनमें से औसतन हर व्यक्ति को खेती से तीन सौ करोड़ रुपये की आमदनी हुई! किस जमीन पर क्या बोया था इन्होंने कि खेती कर इतनी कमाई कर ली?

Agricultural Income or Laundering of Black Money?

साल में 300 करोड़ रुपये कमाई वाली खेती?

जहाँ पिछले बीस बरसों में खेती की हालत लगातार चिन्ताजनक बनी हुई हो, तीन लाख से ज्यादा छोटे-मँझोले किसान आत्महत्या कर चुके हों, वहाँ यह छह लाख लोग कितने हेक्टेयर जमीन पर कौन-सी फसल उगा रहे थे कि उन्हें औसतन तीन अरब रुपये से भी ज्यादा की कमाई एक साल में हो गयी? जबकि देश में 70% जोत एक हेक्टेयर से भी कम है। और केवल 17%  जोत एक से दो हेक्टेयर के बीच है। देश की कुल कृषि योग्य भूमि में केवल 13.50%  जोत का आकार चार हेक्टेयर से ज्यादा है। तो केवल इतनी-सी जमीन पर इतनी हाहाकारी फसल कैसे हो गयी? और अगर इतनी फसल हुई तो कहाँ गयी? मंडियों में पहुँची? गोदामों में गयी? निर्यात हुई? मंडी, गोदाम और निर्यात के आँकड़ों में ऐसी कोई नाटकीय बढ़ोत्तरी नहीं है। तो फिर साल में 300 करोड़ रुपये कमाई वाली खेती?

Shocking Data from 2007 to 2012 reveals the magnitude of Black Money

अब जरा आँकड़ों पर गौर कीजिए। 2007 में 78 हजार से ज्यादा लोगों ने 2,361 करोड़ रुपये की कृषि आय घोषित की यानी औसतन प्रति व्यक्ति सिर्फ तीन लाख रुपये सालाना। इसमें कोई भी अजूबा नहीं है। प्रति व्यक्ति औसत मामूली है, लेकिन अगले साल 'खेती करनेवालों' की संख्या नाटकीय ढंग से दोगुनी से ज्यादा बढ़ गयी और दो लाख से ज्यादा लोगों ने 17 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की 'कृषि आय' घोषित की, यानी प्रति व्यक्ति औसत कृषि आय बढ़ कर 8.32 लाख रुपये सालाना के आसपास पहुँच गयी! यानी कमाई भी दोगुना से ज्यादा बढ़ गयी! अगले साल 2009 में क़रीब दो लाख पैंतालीस हज़ार लोगों ने कृषि आय घोषित की, लेकिन उनकी कमाई का आँकड़ा मामूली घट कर क़रीब साढ़े सोलह हज़ार करोड़ रुपये रह गया। नाटकीय उछाल आया 2010 में। कृषि आय घोषित करने वालों की संख्या चार लाख के ऊपर पहुँच गयी और उन्होंने 83 हज़ार करोड़ रुपये की आय घोषित की यानी प्रति व्यक्ति सालाना औसत 19 लाख 73 हजार रुपये से ज्यादा। सिर्फ इन्हीं आँकड़ों को देखें तो पायेंगे कि महज़ चार सालों में प्रति व्यक्ति औसत कृषि आय छह गुना से ज्यादा बढ़ गयी! है न करिश्मा!

असली करिश्मा दो सालों यानी 2011 और 2012 में हुआ!

लेकिन असली करिश्मा तो अगले दो सालों यानी 2011 और 2012 में हुआ। 2011 में साढ़े छह लाख से ज्यादा लोगों ने करीब बीस करोड़ करोड़ रुपये की कुल कृषि आय घोषित की, औसतन प्रति व्यक्ति तीन सौ करोड़ रुपये सालाना से ज्यादा की आमदनी खेती से दिखायी गयी! अगले साल यानी 2012 में कृषि आय घोषित करनेवालों की संख्या तो बढ़ कर आठ लाख से ऊपर हो गयी, लेकिन कृषि आय पिछले साल के मुकाबले नाटकीय ढंग से दो तिहाई गिर कर सिर्फ छह करोड़ करोड़ रुपये रह गयी, जो देश की जीडीपी का चार गुना है! और इस हिसाब से इन लोगों की प्रति व्यक्ति औसत कृषि आय 83 करोड़ रुपये सालाना के आसपास दिखायी गयी!

It all started when World has started taking stringent actions against Black Money

ध्यान दीजिए, इन्हीं वर्षों में काले धन को लेकर पूरी दुनिया में हलचल बढ़ना शुरू हुई, कई देशों में क़ानूनी सन्धियाँ हुईं या पहले की सन्धियाँ बदली गयीं। काले धन को लेकर कई खुलासे हुए, कई सूचियाँ सामने आयीं। भारत में भी सरकार की ओर से काले धन को वापस लाने और उजागर करने की कोशिशें शुरू हुईं। और करीब-करीब लगने लगा कि शायद विदेशों में काला धन रखना सम्भव न हो। इसलिए काफी काला धन पार्टिसिपेटरी नोट्स के जरिये शेयर बाजार में लगा और बाकी की धुलाई 'कृषि आय' के तौर पर हो गयी।

UPA सरकार को कैसे इसका पता नहीं चला?

आश्चर्य है कि 2007 से 2012 तक लगातार चले इस गोरखधन्धे का पता यूपीए सरकार को नहीं चला! इनकम टैक्स विभाग में लोगों के रिटर्न देख कर कोई चौंका क्यों नहीं? किसी ने कोई सवाल क्यों नहीं किया? जाहिर है कि इसमें कई राजनेताओं का भी बड़ा पैसा होगा और ऐसे लोग शायद सभी पार्टियों में हों। तो क्या इसका सच सामने आयेगा? फिलहाल मोदी सरकार का कहना है कि वह जाँच करा रही है। वैसे बेहतर होता कि इस पूरे मामले को भी काले धन के लिए बनी विशेष टास्क फ़ोर्स को सौंपा जाये ताकि पूरा सच सामने आ सके।

काले धन पर 'राग देश' के दो पिछले लेख:

काला जादू और भेड़ बनीं सरकारें!

काले धन का टेंटुआ कोई क्यों पकड़े?

But who really cares to curb Black Money?

वैसे काले धन को लेकर असली चिन्ता किसे और कहाँ है? न सरकार को है, न जनता को! राष्ट्रवाद के नारे लगाना अलग बात है, देश के लिए टैक्स देना अलग बात है! लेकिन टैक्स देना कौन चाहता है? सब जानते हैं कि रियलिटी सेक्टर और राजनीति काले धन के दो सबसे बड़े महासागर हैं, लेकिन काले धन पर बावेला मचा कर सत्ता में आयी मोदी सरकार ने दो साल में इन दोनों क्षेत्रों में काले धन के बहाव को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया। राजनीति में तो यह काम बहुत आसानी से हो सकता है। बस यह करना है कि एक रुपये का भी चन्दा हो तो रसीद कटे और साथ में वोटर आइडी का नम्बर डाल दिया जाये। सारा चन्दा 'स्वच्छ' हो जायेगा।

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चन्दे का गोलमाल और दुधारू सर्वेक्षण!

तमाशों के बताशे खाइए!

असली मुद्दों पर कोई चिंता क्यों नहीं?

इसलिए 'काली खेती' के इस भंडाफोड़ पर देश में कहीं कोई चिन्ता नहीं दिखी। इसी बीच एक और खबर आयी। FSSAI यानी फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के सर्वेक्षण के मुताबिक देश में बिकनेवाला 68% दूध मिलावटी और घटिया है, कई जानलेवा बीमारियों का कारण है यह, लेकिन इस पर किसी को चिन्ता नहीं हुई। अपनी जान और सेहत की परवाह यहाँ किसे है? और मजे की बात है कि यह सर्वेक्षण पाँच साल पुराना है, लेकिन इन पिछले सालों में न UPA सरकार ने मिलावट रोकने के लिए कुछ किया, न NDA सरकार ने! ऐसी बातें किसी सरकार के लिए कभी चिन्ता का विषय नहीं होतीं, क्योंकि जनता को ही इनकी कोई चिन्ता नहीं होती।

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जागिए, मैगी ने झिंझोड़ कर जगाया है!

'प्रसन्नता सूचकांक'में पाकिस्तान से भी पीछे क्यों?

इसी बीच, इस हफ्ते एक तीसरी खबर भी आ गयी कि 'प्रसन्नता सूचकांक' (Happiness Index) में हम और लुढ़क कर 118वें स्थान पर पहुँच गये और थाइलैंड (33वाँ नम्बर), मलयेशिया (47वाँ नम्बर) फिलीपीन्स (82वाँ नम्बर) और यहाँ तक कि पाकिस्तान (92वाँ नम्बर) भी हमसे कहीं आगे है।

बहस 'भारत माता की जय' पर

लेकिन देश को इस सबकी कहाँ फिक्र? यहाँ तो बहस 'भारत माता की जय' पर हो रही है। इधर संघ, उधर ओवैसी। दोनों को नयी जमीन की तलाश है। दोनों एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं, एक-दूसरे को मजबूत कर रहे हैं! नेहरू से लेकर अन्ना और केजरीवाल तक की सभाओं में जिस 'भारत माता की जय' के नारों पर कभी किसी को आपत्ति नहीं हुई, अचानक संघ ने इस सवाल को क्यों उछाल दिया और जवाब में असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) क्यों मैदान में उतर आये? जाहिर-सी बात है कि पिछले दो सालों में संघ की भड़काऊ गतिविधियों के कारण ओवैसी अब संघ के खिलाफ अपने आपको मुसलमानों का एकछत्र नेता देखना चाहते हैं। कई राज्यों के चुनावों में उतरने की उनकी तैयारी है। मुसलमानों का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो जाये, तो उनका काम बन जाये। इसलिए वह वही कर रहे हैं। फिलहाल, अच्छा यही रहा कि देश के मुसलमान अब तक ओवैसी के झाँसे में नहीं आये। http://raagdesh.com

(देश मंथन, 21 मार्च 2016)

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