राजेश रपरिया :

मोदी सरकार के लगभग दो साल के राज में खेती और उससे जुड़े लोगों के आर्थिक हालात मनमोहन सिंह राज के अंतिम दो तीन सालों से ज्यादा खराब हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हताशा व्याप्त है प्राकृतिक आपदाओं की बेरहम मार तो खेती को झेलनी ही पड़ी है पर मोदी सरकार के रवैये ने खेती के संकट को खूंखार बना दिया है। अनेक राज्यों में किसानों की बढ़ती आत्महत्याएँ ग्रामीण भारत में बढ़ती हताशा और निराशा का द्योतक है। 

पिछले 100 साल में चौथी बार लगातार दो साल सूखा पड़ा है। सूखे की ऐसी बेरहम मार पिछली बार 1986-87 में पड़ी थी। 2014 में 12% बारिश कम हुई थी लेकिन 2015 में जून-सितंबर के चार महीनों में दक्षिण पश्चिम मानसून की औसत बारिश 610.8 मिलीमीटर हुई। देश में इस मानसून में औसत 773.6 मिलीमीटर बारिश हुई थी। यानी इस मौसम में सामान्य से 14% कम बारिश हुई है। पिछले साल मार्च-अप्रैल में बेमौसम भारी बारिश से रबी की फसल और चौपट हो गयी। गेहूँ, चावल और कपास की कीमतों में आई गिरावट ने सूखे की मार को विकराल बना दिया, जिससे खेती की आमदनी में भारी गिरावट आयी।

इस बार भी खेतों में कम नमी और उत्तर पूर्वी मानसून से रबी फसल में कम पैदावार का खतरा आसन्न है। यानी लगातार चौथी फसल होगी, जिसमें पैदावार सामान्य से काफी कम रहेगी। भारतीय खेती कर्जों में डूबी हुई है। किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। अब तक देश के नौ राज्य तेलंगाना, ओड़ीशा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश की खेती भयंकर सूखे चपेट में आ चुकी है। देश के आधे से ज्यादा जिलों में सूखा है। इन राज्यों ने केंद्र सरकार से राहत माँगी है। पर केंद्र सरकार ने जो राहत दी है वह ऊँट के मुँह में जीरा है। मोदी सरकार यह दावा करती रही है कि उसके राज में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार आया है, लेकिन जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है। दो सौ करोड़ डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था में किसी का योगदान 15% है। लेकिन आधी आबादी कृषि और उससे जुड़ी आय पर निर्भर है। गाँवों में 83.30 करोड़ लोग रहते हैं। इनमें तकरीबन 67 करोड़ लोग गरीब हैं यानी 26 रुपये रोज पर वे गुजर-बसर करते हैं। पिछले दो सालों में सूखे के चलते कम पैदावार के कारण कृषि आय में भारी गिरावट आई है। पर ग्रामीण मजदूरी में आयी मंदी से हालात और खराब हुए हैं। 

छोटे किसानों के जीवन यापन में 60% आमदनी गैर कृषि (मजदूरी) है। मजदूरी गिरने से दोहरी मार छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों पर पड़ी है, जिससे वे भारी मात्रा में गाँवों से पलायन को मजबूर हैं। देश में 12 करोड़ कृषक किसान हैं और 14.40 करोड़ खेतीहर मजदूर। हर दूसरा पुरुष मजदूर और तीन में से दो महिलाएँ कृषि पर आश्रित हैं। अक्टूबर 14 तक ग्रामीण मजदूरी की दर 14% थी, जो मई 15 के आते-आते महज 3% रह गयी। यानी खुदरा महँगाई दर से भी कम। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि उनकी वास्तविक मजदूरी बढ़ी नहीं बल्कि कम हुई है। मसलन मई 2015 में ग्रामीण मजदूरी 272.78 रुपये थी जो मार्च 15 की औसत मजदूरी से भी कम है। छोटी किसान और खेतिहर मजदूरों को कंस्ट्रक्शन उद्योग से काफी सहारा मिलता है। इस क्षेत्र में मंदी पसरी हुई है। नतीजा यह है कि मजदूरी की अभाव में यह लोग पुन: गाँव लौट रहे हैं। इससे भी ग्रामीण मजदूरी बढऩे में भारी रुकावट आई है।

मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खेती की व्यथा की बातें अवश्य करते हैं। लेकिन उनके कामकाज में यह व्यथा-करुणा नजर नहीं आती। 2011 तक ग्रामीण आय में औसत 20% की वृद्धि हुई, जो 2015 में एकल ही नहीं रह गई, बल्कि नाममात्र की बढ़ोतरी उसमें हुई है। मोदी सरकार के नीति आयोग के सदस्य के शोध पत्र के अनुसार कृषि अर्थव्यवस्था में अचानक हताशा का मुख्य कारण है कि कृषि आय में वृद्धि गिरकर महज 1% रह गयी है। वैसे तो 2011 से कृषि अर्थव्यवस्था में हताशा पसरने लगी थी लेकिन 2014 से यह हताशा ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी। 2005 से 2013 के दरम्यान न्यूनतम समर्थन मूल्य में तकरीबन 300% का इजाफा हुआ। इसके साथ ही मनरेगा व अन्य सामाजिक व्यय में बढ़ोतरी से ग्रामीण आय में मजबूत वृद्धि हुई। पर मोदी राज में हाल के महीनों में ही गेहूँ, दलहन और ज्वार आदि के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि हुई है, जो मनमोहन सिंह राज की तुलना में बेहद कम है। अपेक्षित विकास दर नहीं होने से मोदी सरकार के सुर बदले हैं, उन्हें ग्रामीण भारत की याद आ गयी है। उम्मीद है कि आगामी बजट में ग्रामीण भारत व कृषि क्षेत्र के लिए अधिक आवंटन होगा। मोदी सरकार को किसी शायर की ये पंक्तियाँ याद रखनी चाहिए - चुप हैं किसी सब्र से तो पत्थर न समझ हमें... दिल पे असर हुआ है तेरी बात बात का।

(देश मंथन, 03 फरवरी 2016)

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